2122 - 2122 - 2122 - 212
ख़ून की जब तक ज़रूरत थी मेरे चाहा मुझे
बा'द अज़ाँ बस दूध की मक्खी समझ फेंका मुझे
उसने जब मंज़िल की जानिब गामज़न पाया मुझे
तंज़ से मा'मूर नफ़रत की नज़र देखा मुझे
हक़-ब-जानिब बढ़ गए जब ये क़दम रुकते नहीं
मुश्किलों ने बढ़के यूँ तो लाख रोका था मुझे
अपने अहसाँ के 'इवज़ वो कर गया ख़ूँ का हिसाब
यारो उसने तो कहीं का भी नहीं छोड़ा मुझे
हाल-ए-ग़म कहने गया था मानकर जिसको ख़ुदा
ख़ुद परेशाँ था वो मुडकर भी नहीं देखा मुझे
दोस्त जितने थे मेरे सब दूर जा बैठे हैं वो
दुश्मनों का शुक्रिया तन्हा नहीं छोड़ा मुझे
हाल मेरी बेबसी का सुनके सबसे कह दिया
क्या किया तूने ओ यारा कर दिया रुसवा मुझे
मर मिटा था उस अदाकारा की इक मुस्कान पर
मुस्करा कर उसने जब शोख़ी से देखा था मुझे
मेरे बाज़ू और निगाहें दोस्त निकले बेवफ़ा
ख़ुद की नज़रों ने ही देखो दे दिया धोका मुझे
फिर रहा हूँ आज दर-दर सब करम अपनों का है
घर मेरा नीलाम कर ठोकर पे रख छोड़ा मुझे
छीन मुझसे ले गया वो हाफ़िज़ा मेरा 'अमीर'
ख़ुद भी तन्हा रह गया और कर गया तन्हा मुझे
"मौलिक व अप्रकाशित"
बा'द अज़ाँ - इसके बा'द, तदुपरांत, after that. गामज़न - अग्रसर, (तेज़ी से) बढ़ते हुए, stepping out.
तंज़ से मा'मूर - कटाक्ष भरी, कपटपूर्ण, Leery, Lascivious look, हक़-ब-जानिब- सच्चाई के पक्ष में,
सहीह रास्ते पर, stand with justice and truth. 'इवज़ - बदले में, प्रतिफल, मुआवज़ा, recompense.
शोख़ी - चंचलता, चुलबुलाहट, शरारत, playfulness, pertness. हाफ़िज़ा - याददाश्त, memories.
Comment
जनाब लक्ष्मण धामी भाई मुसाफ़िर जी आदाब, ग़ज़ल पर आपकी आमद और ज़र्रा नवाज़ी का बहुत बहुत शुक्रिया। सादर।
आ. भाई अमीरुद्दीन जी, सादर अभिवादन। अच्छी गजल हुई है । हार्दिक बधाई।
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