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ग़ज़ल (हुस्न तो  मिट जाएगा...)

2122 -  2122 -  2122 - 212

 

हुस्न तो  मिट जाएगा  फिर भी अदा रह जाएगी 

ढल  चलेगी  ये  जवानी  पर  वफ़ा  रह  जाएगी 

साथ मेरे  तुम हो जब  तक प्यार की  सौग़ात है 

बिन तुम्हारे  ज़िन्दगी ये  इक सज़ा  रह  जाएगी 

जब तलक  माँ-बाप राज़ी  बस दुआ मक़्बूल है 

दिल दुखा तो फ़र्श पर  ही  हर दुआ रह जाएगी 

ईद का दिन है  तेरी  रहमत भी  है अब जोश में 

मेरे जैसों की भी झोली  ख़ाली क्या रह जाएगी

कर भलाई  के भी तू  कुछ  काम है मौक़ा अभी 

हश्र  में   ये  आरज़ू   हसरत-ज़दा   रह  जाएगी 

हुक्म जब तक हो न रब का बूँद भी गिरती नहीं 

बस  उमड़ती  गड़गड़ाती  ही  घटा  रह  जाएगी 

ये नहीं  बच्चे  मियाँ !  शैतान  के  बावा  हैं  सब  

इनके आगे  क्या  छुपी  कोई  ख़ता  रह जाएगी 

आपके  बच्चों  से  तो  शैतान  भी  मांगे  पनाह 

घर में फिर  कैसे  टिकी  कोई  बला रह जाएगी 

लौट कर आने का उनसे क्या करें वा'दा 'अमीर' 

हम नहीं गर आ सके तो  बात क्या  रह जाएगी 

''मौलिक व अप्रकाशित'' 

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Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' on September 21, 2021 at 8:54pm

जनाब आशीष यादव जी आदाब, ग़ज़ल पर आपकी उपस्थिति, ज़र्रा नवाज़ी और हौसला अफ़ज़ाई का तह-ए-दिल से शुक्रिया।  सादर।

Comment by आशीष यादव on September 21, 2021 at 8:10pm

आदरणीय श्री अमीरुद्दीन 'अमीर' साहब सादर नमस्कार। 

बेहतरीन गजल पर मुबारकबाद स्वीकार कीजिए।

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' on September 19, 2021 at 10:02am

जनाब लक्ष्मण धामी भाई मुसाफ़िर जी आदाब, ग़ज़ल पर आपकी आमद और ज़र्रा नवाज़ी का शुक्रिया।  सादर।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on September 18, 2021 at 9:30pm

आ. भाई अमीरुद्दीन जी, सादर अभिवादन। सुन्दर गजल हुई है । हार्दिक बधाई। 

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