For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

चिड़ियों के चहक में आज कोलाहल था शोर था

उत्तर के पुरे आसमान में काले बादल का ज़ोर था

पेड़ अभी तक शांत खड़े थे धूल की ना कोई रैली थी

सूरज अब तक ढला नहीं था ना तो अंधियारी फैली थी

हवा थमी फिर सूरज चमका गर्मी थोड़ी और बढ़ी

काले बादलों की एक टोली आसमान में और चढ़ी

एक तरफ थे काले बादल एक तरफ उजियरा था

भी कहीं पर चमकी बिजली बारिश का इशारा था

बच्चे छत पर खड़े हुए थे बारिश की अभिलाषा में

बादल भी कुछ बता रहे थे टेढ़ी मेढ़ी भाषा में

भी हवाएं तेज़ हो गयी धूल को अपने साथ लिए

बच्चे छत से दौरे घर तक कपडे सारे साथ लिए

बस कुछ क्षण के लिए यहां पर मौसम बड़ा सुहाना था

किसे पता था अभी यहां पर चक्रवात को आना था

काले-काले बादल ने फिर आसमान को घेर लिया

धूल भरी हवाओं ने कुछ बिन कहे जंग सा छेड़ दिया

बिजली कड़की आंधी आयी पानी की बौछारें भी

बह गए सारे किट पतंगे भर गए सारे नाले भी

पेड़ पर रहने वाले सारे पक्षियों ने हाहाकार किया

खिड़की और दरवाज़ों ने मिलकर खुदको तैयार किया

छत उड़ गयी कही किसी की बिजली के कहीं तार गिरे

पेड़ टूटकर गिरे कहीं पर प्राणी कई हजार मरे

छोटे छोटे चिडियों के घोंसले भी थे बिखर गए

बरगद के भी पेड़ कही पर पूरी तरह थे उखड गए

बिजली गिरी फिर एक मकान में दो लोगों को निगल गयी

लोहे की एक छड़ी परी थी मोम के जैसे पिघल गयी

फसले पूरी खाक हो गयी यहाँ-वहाँ सब बिखर गयी

पुरे खेत की मिटटी तक भी जहाँ-तहाँ थी पसर गयी

देख कर ऐसे महा भयंकर चक्रवात के रूप को

खड़े हुए सब हाथ को जोड़े प्रकृति के स्वरुप को

बहुत ज्ञान है पास हमारे अपने दंभ हजार है

पर प्रकृति की क्रोध के आगे मनुष्य बड़ा लाचार है

"मौलिक व अप्रकाशित" 

अमन सिन्हा 

Views: 230

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on March 18, 2022 at 9:06pm

आदरणीय अमन सिन्हा जी, आपकी रचनाओं पर संभवतः पहली बार मैं टिप्पणी कर रहा हूँ. 

आँधी शीर्षक के हवाले से आपने वास्तविक शब्द-चित्रण किया है. आपका अभ्यास आपकी रचनाओं को और निखारेगा, इसमें संदेह नहीं. 

अलबत्ता, व्याकरण तथा शब्दों के हिज्जै के प्रति सजग रहें. यथा, चहक स्त्रीलिंग होने से ’चिडियों की चहक’ होगा. या पूरे शुद्ध रूप है न कि पुरे. हिज्जै का शुद्ध प्रयोग गेयता के लिए अत्यंत आवश्यक है. 

आगे, पंक्तियों के विन्यास पर भी ध्यान दिया जाना आवश्यक है. आप खुल कर सतत अभ्यास करें. प्रस्तुतियाँ निखरती जाएँगी. 

शुभ-शुभ

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Blogs

Latest Activity

Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post दोहा पंचक. . . . रिश्ते
"आदरणीय लक्ष्मण धामी जी सृजन के भावों को मान देने का दिल से आभार आदरणीय "
5 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' posted a blog post

तब मनुज देवता हो गया जान लो,- लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२१२/२१२/२१२/२१२**अर्थ जो प्रेम का पढ़ सके आदमीएक उन्नत समय गढ़ सके आदमी।१।*आदमीयत जहाँ खूब महफूज होएक…See More
12 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Sushil Sarna's blog post दोहा पंचक. . . . रिश्ते
"आ. भाई सुशील जी, सादर अभिवादन। सुंदर दोहै हुए हैं। हार्दिक बधाई।"
12 hours ago
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा पंचक. . . . रिश्ते

दोहा पंचक. . . . रिश्तेमिलते हैं  ऐसे गले , जैसे हों मजबूर ।निभा रहे संबंध सब , जैसे हो दस्तूर…See More
yesterday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post देवता क्यों दोस्त होंगे फिर भला- लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"
"आ. भाई सौरभ जी, सादर अभिवादन व आभार।"
yesterday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post सच काफिले में झूठ सा जाता नहीं कभी - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'
"आ. भाई रवि जी, सादर अभिवादन। गजल पर उपस्थिति और सुंदर सुझाव के लिए हार्दिक आभार।"
yesterday
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-130 (विषय मुक्त)
"बेशक। सच कहा आपने।"
yesterday
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-130 (विषय मुक्त)
"मेरा प्रयास आपको अच्छा और प्रेरक लगा। हार्दिक धन्यवाद हौसला अफ़ज़ाई हेतु आदरणीय मनन कुमार सिंह जी।"
yesterday
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-130 (विषय मुक्त)
"आदाब।‌ नववर्ष की पहली गोष्ठी में मेरी रचना पर आपकी और जनाब मनन कुमार सिंह जी की टिप्पणियों और…"
yesterday
Manan Kumar singh replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-130 (विषय मुक्त)
"प्रेरक रचना।मार्ग दिखाती हुई भी। आज के समय की सच्चाई उजागर करती हुई। बधाइयाँ लीजिये, आदरणीय उस्मानी…"
yesterday
Manan Kumar singh replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-130 (विषय मुक्त)
"दिली आभार आदरणीया प्रतिभा जी। "
yesterday
Manan Kumar singh replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-130 (विषय मुक्त)
"हार्दिक आभार आदरणीय उस्मानी जी। "
yesterday

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service