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जब मैं चलता हूँ तो साथ साथ वो भी चलती है

जहां मैं मुड़ा कहीं मेरे साथ वो भी मुड़ जाती है

रूप रंग में हाव-भाव में बिल्कूल मेरे जैसी है

मैं तो दीखता हूँ हर जगह वो कहीं-कहीं छुप जाती है

सूरज हो या चाँद फलक पर इसको फर्क नही पड़ता

खोली हो या हो कोई हवेली इसको डर नहीं लगता

आगे पीछे ऊपर निचे ये कही भी हो सकती है

टेढ़ी मेढी छोटी मोटी ये कैसी भी हो सकती है

ब्राह्मण हो या राजपूत हो या फिर कोई हरिजन हो

चाहे कोई हो गोरा काला पराया या परिजन हो

उंच-नीच का भेद-भाव का इस पर कोई असर नहीं

जात-पात और आन-मान की इसको कोई खबर नहीं

ये ना देखे मंदिर मस्जिद गिरजा घर या गुद्वारा हो

मुस्लिम का हो मय खाना या हिन्दू की मधुशाला हो

लोग अलग हो जितने चाहे सबको एक दिखलाती है

सबकी एक ही हालत है हर बार यही समझाती है

पास है पर साथ नहीं वो धरती पर है आकाश नहीं

उजियारे से है इसकी यारी तिमिर से होती बात नही

कहीं कभी जो हम छूप जाए या अँधेरा छा जाये

बादल भी आ जाए तो फिर ये कहीं पर खो जाए

"मौलिक व अप्रकाशित" 

अमन सिन्हा 

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Comment by Saurabh Pandey on March 18, 2022 at 9:16pm

आदरणीय अमन सिन्हा जी, सहज सरल शब्दों ंमें आपने रचनाभ्यास किया है. इस हेतु हार्दिक बधाई. 

आप पटल पर उपलब्ध अन्य रचनाकारों की रचनाओं का भी पाठ करें तथा उनके शब्द तथा भाव विन्यास पर एकाग्र हों. इससे आपकी रचनाप्रक्रिया के आशातीत सुधार होगा. शब्दों के हिज्जै पर भी आप अवश्य ध्यान दें. अन्यथा आपके प्रयास में अनावश्यक विकार बना रहेगा जो आपकी रचना को किसी स्वादिष्ट लुकमे में बालुका राशि की उपस्थिति तरह त्याज्य बनाये रखेगा. 

आप किसी अच्छे शब्दकोश की भी मदद लेते रहें. शब्दकोश का संदर्भ लिया जाना आपके शब्दों के गठन और उसकी बुनावट को शुद्ध रखेगा.

शुभ-शुभ

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