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फैला आँचल है बहुत, लेकिन चोली तंग।
धरा  देश  की  देखिए, लिए  अनोखे रंग।।
*
भरें अनोखे रंग नित, जीवन में त्योहार।
तभी सनातन धर्म में, है इनकी भरमार।।
*
बहना, माता, सहचरी, बंधु , तात आधार।
भरे अनोखे रंग नित, मीत रूप में प्यार।।
*
बचपन यौवन वृद्धता, चलते संग कुसंग।
नित  जीवन  देता  रहा, हमें  अनोखे रंग।।
*
बड़े अनोखे  रंग  यूँ, रखती धरती पास।
पानी पानी है कहीं, कहीं सिर्फ है प्यास।।
*
विविध अनोखे रंग की, मौसम मौसम धार।
धरती हँसे  वसन्त  में, ग्रीष्म  जले हर बार।।
*
पतझड़, पावस ग्रीष्म सह, चुरा शीत से मीत।
पोत  अनोखे  रंग  अब,  फागुन  गाता  गीत।।
*
सतरंगी सपने हुए, यौवन लिया उभार।
रंग अनोखे प्रीत के, होली का उपहार।।
*
बचपन बीता खेलते, सखी सहेली संग।
चढ़ते योवन दे गया, पिया अनोखे रंग।।
*
कहीं छाँव ही छाँव है, कहीं धूप ही धूप।
सजा अनोखे रंग  से, धरा  चली है रूप।।
*
रोने हँसने क्रोध सह, सुख दुख जोश उमंग।
हर  जीवन  घुलते  रहे,  सदा  अनोखे  रंग।।

//
मौलिक/अप्रकाशित-
लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 19, 2022 at 8:03am

आ. भाई सौरभ जी, सादर अभिवादन। दोहों पर उपस्थिति, उत्साहवर्धन व स्नेहाशीष के लिए हार्दिक आभार। 

आपकी सतत उत्साहवर्धक व मार्गदर्शक प्रतिक्रिया निरंतर प्रयास को प्रेरित करती हैं । यह आशीष सदा बना रहे यही कामना है । सादर..


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on March 17, 2022 at 10:32pm

आपके फागुनी दोहे बहुत कुछ कहते हुए भी कितने शिष्ट और संयत हैं, आदरणीय लक्ष्मण धामी जी ! वाह-वाह.. 

प्रस्तुत दोहे का वैशिष्ट्य निस्संदेह मोहक है. 

//भरें अनोखे रंग नित, जीवन में त्योहार।
तभी सनातन धर्म में, है इनकी भरमार //

शुभातिशुभ .. होली की शुभकामनाएँ

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 16, 2022 at 11:00pm

आ. भाई सुशील जी, सादर अभिवादन। दोहों पर आपकी उपस्थिति व प्रशंसा से उत्साहवर्धन हुआ। हार्दिक धन्यवाद।

Comment by Sushil Sarna on March 15, 2022 at 2:03pm
वाह आदरणीय लक्ष्मण धामी जी बहुत सुंदर और सार्थक दोहावली हुई है, दिल से बधाई स्वीकार करें सर ।

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