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हर तरफ़ रौशनी के डेरे हैं (ग़ज़ल)

2122  /  1212  /  22

हर तरफ़ रौशनी के डेरे हैं

मेरी क़िस्मत में क्यूँ अँधेरे हैं [1]

एक अर्सा हुआ उन्हें खोये

अब भी कहता है दिल वो मेरे हैं [2]

और कुछ देर हौसला रखिये

शब के आगे ही तो सवेरे हैं [3]

है धनक एक एक ज़र्रे में

रंग ये किसने यूँ बिखेरे हैं [4]

फ़ैसला सीरतों का यूँ ही सही

ऐब मेरे हैं वस्फ़ तेरे हैं [5]

किस तरह शुक्रिया करूँ उनका

जिन दुआओं ने दिन ये फेरे हैं [6]

इस शरीफ़ों के शह्र में 'शाहिद'

कू-ब-कू चोर और लुटेरे हैं [7]

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment

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Comment by रवि भसीन 'शाहिद' on October 8, 2022 at 5:14pm

आदरणीय अमीरुद्दीन 'अमीर' साहिब, ग़ज़ल को अपना क़ीमती वक़्त देने के लिए और दाद के लिए आपका तह-ए-दिल से शुक्रगुज़ार हूँ। सुझाव के लिए बहुत शुक्रिया जनाब।

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on October 7, 2022 at 6:29pm

मुहतरम रवि भसीन 'शाहिद' जी आदाब, क्या ख़ूब ग़ज़ल कही है, हर एक शे'र कमाल है, शे'र दर शे'र दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ।

'शब के आगे ही तो सवेरे हैं' इस मिसरे पर पुनर्विचार कीजियेगा। 

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