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बहुत रुलाया शहर ने  ,
दी जहर फिजा में  घोल ,
खुश रहना हैं तो यारो ,
चलो गाँव की ओर .
हर तरफ हैं मोटर ,
जो शोर मचाती हैं ,
कसम से यारो दिन क्या ,
रातों को नींद नहीं आती हैं ,
प्यारा नहीं लगता हैं 
यारा यहाँ का भोर ,
खुश रहना हैं तो यारो ,
चलो गाँव की ओर ,
यहाँ के तलाब को देखो ,
कितना गन्दा पानी हैं ,
चले जाओ किसी बस्ती में ,
हर तरफ परेशानी हैं ,
खुशियाँ तो सिमट गई हैं ,
ऊँची मंजिल की ओर ,
खुश रहना हैं तो यारो ,
चलो गाँव की ओर ,
एक घर में पहुच गया ,
समझा देख के अन्दर का मंजर 
शहर हैं पैसे वालो का ,
क्या ठाठ हैं उसके अन्दर ,
कितना सुन्दर तलाब बना ,
स्विमिंग पुल कहलाता हैं ,
बच्चा को देखा मैंने ,
पैसा देकर पार्क में जाता हैं ,
हम गरीबो के पास ,
नहीं हैं इसका तोड़ ,
खुश रहना हैं तो यारो ,
चलो गाँव की ओर .

 

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Comment

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Comment by Rash Bihari Ravi on August 24, 2011 at 4:48pm

dhanyabad aap sabhi ko

Comment by Ravi Prabhakar on August 22, 2011 at 8:14pm

साधू-साधू! शहरी जीवन शैली का कटु सत्य। बधाई भाई!


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on August 14, 2011 at 9:03pm

khubsurat rachna Guru jee , badhai

Comment by आशीष यादव on August 6, 2011 at 10:25pm

sundar rachna. shahar ki pareshani aur ganv ka aanad.

बहुत रुलाया शहर ने  ,
दी जहर फिजा में  घोल ,
खुश रहना हैं तो यारो ,
चलो गाँव की ओर .
congrats.

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on August 6, 2011 at 10:02pm

//खुश रहना हैं तो यारो ,

चलो गाँव की ओर .//
बहुत खूब.. असर आ रहा है रचनाओं में. टकण-त्रुटि दुरुस्त करा लें.
Comment by Rash Bihari Ravi on August 6, 2011 at 5:04pm

dhanyabad sir ji

Comment by satish mapatpuri on August 6, 2011 at 4:26pm
बहुत रुलाया शहर ने ,
दी जहर फिजा में घोल ,
खुश रहना हैं तो यारो ,
चलो गाँव की ओर
बहुत ही खुबसूरत ख्याल पेश किया है गुरूजी,बहुत -बहुत धन्यवाद.

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