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किसी को मत अपना मान परिंदे

किसी को मत अपना मान परिंदे
ये दुनिया बड़ी बेईमान परिंदे
मंदिर-मस्जिद ढूंढ़ रहा किसको
हर गली बिकता भगवान परिंदे
मोह का झूठा बंधन दुनियादारी
मत उलझा इसमें जान परिंदे
सांसों के पंख नहीं वश में अपने
ज़िस्मानी पंख झूठी शान परिंदे
मन की तिजोरी जब तक खाली
दौलत पर कैसा अभिमान परिंदे
जितना ऊपर उड़ता जीवन पंछी
खुलता सच का आसमान परिंदे
दुनिया में जो जीना चाहे सुख से
बंद रख आँखें और कान परिंदे
मेरी पुस्तक "एक कोशिश रोशनी की ओर "से

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Comment

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Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on March 6, 2013 at 2:47pm

सच्चाई से साक्षात्कार कराती सुन्दर रचना के लिए हार्दिक बधाई आदरणीया आशा पाण्डेय ओझा जी 

Comment by vijay nikore on March 6, 2013 at 2:29pm

आदरणीया आशा जी:

 

सारी पंक्तियों में दुनिया की सच्चाई-ही-सच्चाई है।

इस अच्छी रचना के लिए बधाई।

 

विजय निकोर

Comment by anupama shrivastava[anu shri] on January 14, 2011 at 1:04pm
दुनिया में जो जीना चाहे सुख से
बंद रख आँखें और कान परिंदे
bahut sach....badhaiyan asha ji
Comment by Rash Bihari Ravi on December 10, 2010 at 4:32pm

khubsurat bemisal

Comment by Abhinav Arun on December 10, 2010 at 2:48pm

सुन्दर यथार्थ को अभिव्यक्ति देती गज़ल बधाई _

"मंदिर-मस्जिद ढूंढ़ रहा किसको
हर गली बिकता भगवान परिंदे"

सुन्दर-प्रभावी निवेदन |

Comment by Shaileshwar Pandey ''Shanti'' on October 18, 2010 at 9:55pm
Asha Ji, bahut hi sundar kavita hai...is se pada kar malum hota hai ki vastav me aap ka kaisa vichar hai...aap ko danyavaad jo itani sundar kavita saral shabdo me ham sabhi tak pahuchyi...ham abhari hai aap ke...

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on August 3, 2010 at 11:56pm
मोह का झूठा बंधन दुनियादारी
मत उलझा इसमें जान परिंदे,

बहुत बढ़िया कविता है आशा दीदी, सभी पक्तिया सधी हुई , बहुत सुंदर अभिव्यक्ति , धन्यवाद,
Comment by satish mapatpuri on August 3, 2010 at 1:10pm
मंदिर-मस्जिद ढूंढ़ रहा किसको
हर गली बिकता भगवान परिंदे
मोह का झूठा बंधन दुनियादारी
मत उलझा इसमें जान परिंदे
सादर नमन आशाजी, बड़ी ही सुन्दर रचना है. धन्यवाद.

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