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तड़पता हूँ के अब रोज़ तिरे दिल को दुखा कर

क्यों आ गया मैं हाय कभी हाथ छुड़ा कर,

तड़पता हूँ के अब रोज़ तिरे दिल को दुखा कर।

 

आज नदामत से पथरा गई हैं ये आंखें

आजा के बस इक बार तो आंचल से हवा कर।

 

दिन को सुकूँ शब को भी आराम नहीं है,

हवा भी चली आज ये नश्तर से चुभा कर।

 

अब ए दिल मुझे हयात की ख्वाहिश नहीं रही,

आया है वो मुकाम के मरने की दुआ कर।

 

दरे मौत पे आकर अटका है ये 'इमरान'

आ जा के मिरे जिस्म से ये रूह जुदा कर।

 

इमरान खान 'इमरान' 15 .09 .2011

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Comment by इमरान खान on September 18, 2011 at 9:42pm
@मुहतरम बागी जी..आपको नाचीज़ के अशआर पसंद आये, आपका शुक्रगुजार हूँ, बराये मेहरबानी बहर के लिए इस गज़ल की इसलाह कर दीजिएगा।
Comment by इमरान खान on September 18, 2011 at 9:36pm
@siya sachdev ji...आपका बहुत बहुत धन्यवाद।

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on September 18, 2011 at 5:54pm

दिन को सुकूँ शब को भी आराम नहीं है,

हवा भी चली आज ये नश्तर से चुभा कर।

 

खुबसूरत अशआर कहे है इमरान भाई, एक अच्छी ग़ज़ल बार दाद कुबूल करे |

Comment by siyasachdev on September 15, 2011 at 9:13pm

दिन को सुकूँ शब को भी आराम नहीं है,

हवा भी चली आज ये नश्तर से चुभा कर।..wah umda sher behtareen ghzal.....

 

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