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सिहर जाता हूँ, ऐसा बोलता है - ग़ज़ल : वीनस केशरी

एक नई ग़ज़ल पेश -ए- खिदमत है, मुलाहिजा फरमाए

 


सिहर जाता हूँ, ऐसा बोलता है
वो बस मीठा ही मीठा बोलता है

समय के सुर में बोलेगा वो इक दिन 
अभी तो उसका लहज़ा बोलता है

ये उसकी तिश्नगी * है या तिज़ारत**
वो मुझ जैसे को दरिया बोलता है

उसे खुद ही नहीं मालूम होता
नशे में मुझसे क्या क्या बोलता है

वो  सब कुछ जानता है और फिर भी
अँधेरे को उजाला बोलता है

पुरानी बात है, सब जानते हैं
 नया मुर्गा  ही ज्यादा बोलता है

मेरी माँ आजकल खुश हैं इसी मे
अदब वालों में बेटा बोलता है
-------------------------------------------
*     तिश्नगी   = प्यास
** तिज़ारत = व्यापार

बह्र ए हजज मुसद्दस मह्जूफ़

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Comment

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Comment by आशीष यादव on October 22, 2011 at 10:40am

ek behatarin ghazal. 

क्या बेहतरीन शे'र गढ़े है.

Comment by विवेक मिश्र on October 22, 2011 at 12:43am

'मुकम्मल ग़ज़ल' का एक उदाहरण है ये ग़ज़ल.


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on September 28, 2011 at 12:19am

इन बेशकीमती अशार से आज रू-ब-रू हो पा रहा हूँ. बहुत ही कामयाब कहन पर कमाल की कलमगोई. बधाई.

भाई आपके आत्मविश्वास से दंग हूँ. अच्छा किया, कह दिया ! बहुत अच्छे.

 

 

Comment by वीनस केसरी on September 25, 2011 at 12:51am

पुनः धन्यवाद :)

Comment by Er. Ambarish Srivastava on September 25, 2011 at 12:50am

आपका स्वागत है मित्र !

Comment by वीनस केसरी on September 25, 2011 at 12:25am

अम्बरीष जी इस ख़ूबसूरत हौसलाअफजाई के लिए धन्यवाद

Comment by Er. Ambarish Srivastava on September 25, 2011 at 12:07am

//पुरानी बात है, सब जानते हैं

 नया मुर्गा  ही ज्यादा बोलता है

मेरी माँ आजकल खुश हैं इसी मे
अदब वालों में बेटा बोलता है//
गजब गजब ! क्या बात है वीनस भाई....बहुत खूबसूरत अशआर....
Comment by वीनस केसरी on September 24, 2011 at 11:02pm

योगराज प्रभाकर जी, तिलक जी, राजेन्द्र जी, दुष्यंत जी, गणेश जी और सतीश जी
आप सभी का तहे दिल से शुक्रगुजार हूँ कि आपने ग़ज़ल को पसंद किया व इतने सुन्दर शब्दों में हौसलाअफजाई की, धन्यवाद
आभार

Comment by satish mapatpuri on September 24, 2011 at 9:11pm

उसे खुद ही नहीं मालूम होता
नशे में मुझसे क्या क्या बोलता है

मेरी माँ आजकल खुश हैं इसी मे
अदब वालों में बेटा बोलता है
शानदार ............. अनुपम .............. दाद कबूल करें वीनस जी  

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on September 24, 2011 at 4:02pm

उसे खुद ही नहीं मालूम होता
नशे में मुझसे क्या क्या बोलता है

 

बेहद खुबसूरत ग़ज़ल है वीनस जी, सभी शे'र दहाड़ रहे है, दाद स्वीकार करे |

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