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फर्ज के अलाव में कब तक जलो 

परछाई भी कहने लगी इधर चलो 
चन्दन से लिपट खुद को समझ बैठे चन्दन, 
भ्रम जाल में खुद को कब तक छलो|
हम तो पानी पे तैरती लकड़ी हैं दोस्तों  
सागर भी कहता है अब यूँ ही गलो|
हंस- हंस के गले मिलते हैं जड़े काटने वाले, 
फिर चलते हुए कहते हैं फूलों फलो |
ख़त्म हो चुका है कब से तेल बाती का
पर उनका  यही कहना है रात भर बलो|
 फर्ज के अलाव में कब तक जलो 
परछाई भी कहने लगी इधर चलो| 

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on March 1, 2012 at 10:46am

hardik aabhar Rakesh ji.

Comment by राकेश त्रिपाठी 'बस्तीवी' on March 1, 2012 at 10:37am

mananiyaa Rajesh Kumari ji, bahut ache sher, 

हंस- हंस के गले मिलते हैं जड़े काटने वाले, 
फिर चलते हुए कहते हैं फूलों फलो |
bahut sundar.

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on February 26, 2012 at 8:35am

aabhar neerja ji aapka.


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on February 25, 2012 at 12:34pm

hardik dhanyavaad Ganesh ji


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on February 25, 2012 at 12:15pm
हंस- हंस के गले मिलते हैं जड़े काटने वाले, 
फिर चलते हुए कहते हैं फूलों फलो |
बहुत ही सुन्दर , यदि इसे मीटर में बाँध दिया जाय तो बहुत ही खुबसूरत ग़ज़ल हो सकती है | बधाई स्वीकार करें |

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on February 25, 2012 at 8:52am

bahut bahut abhar Neeraj ji.


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on February 23, 2012 at 9:14pm

abhar Aashutosh ji.


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on February 23, 2012 at 1:34pm

shukriya Aasha ji.

Comment by asha pandey ojha on February 23, 2012 at 1:00pm

हंस- हंस के गले मिलते हैं जड़े काटने वाले, 

फिर चलते हुए कहते हैं फूलों फलो | just superb .. really  very very nice

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on February 23, 2012 at 10:46am

aabhar avinash ji 

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