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सनम मैं क्या लिखूं.....

सनम मैं क्या लिखूँ .............
नयनों से बहते हुए नीर को,
या दिल में चुभते तीर को.
दिखे चेहरा तेरा जिसमे, उस दर्पण को,
या, प्यार में सब कुछ समर्पण को .
या फिर लिखें अपनी फूटी तकदीर को.
नयनों से बहते हुए नीर को,
या दिल में चुभते हुए तीर को.
सनम मैं क्या लिखूँ .............

लिखूँ तुम्हारे रेशमी बालों को,
या उनमे उलझे सारे सवालों को.
लिखूँ अपने दिल की पुकार को,
या तुम जैसे संगदिल यार को.
बंध गई जिसमे मुहब्बत, लिखूँ उस जंजीर को.
नयनों से बहते हुए नीर को,
या दिल में चुभते हुए तीर को.
सनम मैं क्या लिखूँ ..............

इस सागर में उठ रही ऊँची लहर को,
प्यार जैसे अमृत को, या प्यार जैसे जहर को.
लिखूँ तुम्हारी रसभरी बातों को,
या यादों में कटती विरह की रातों को.
रूठ गया भगवान जिसका, लिखूँ उस मंदिर को.
नयनों से बहते हुए नीर को,
या दिल में चुभते हुए तीर को.
सनम मैं क्या लिखूँ ...............

                             

....प्रवीण "सागर"

लिखूँ

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Comment

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Comment by RAJEEV KUMAR JHA on March 17, 2012 at 8:42pm

बहुत सुन्दर भावाभिव्यक्ति,प्रवीण जी.

नयनों से बहते हुए नीर को, या दिल में चुभते तीर को. दिखे चेहरा तेरा जिसमे, उस दर्पण को, या, प्यार में सब कुछ समर्पण को . बहुत सुन्दर पंक्तियाँ हैं.

Comment by Dr Ajay Kumar Sharma on March 17, 2012 at 4:07pm

विरह व्यथा ..सुंदर प्रस्तुति .प्रवीन जी ..बधाई .

Comment by Chaatak on March 12, 2012 at 10:02pm

बहुत खूब! अच्छे शब्दों मे पिरोइ गई कोमल भावनाएँ सहज ही दिल मे उतरती प्रतीत होती हैं|
अच्छी रचना पर हार्दिक बधाई !

Comment by Abhinav Arun on March 12, 2012 at 2:43pm

क्या लिखूं की सोच में बहुत कुछ लिख गए श्री सागर जी !! हार्दिक बधाई इस मधुर रचना हेतु !!

Comment by Brij bhushan choubey on March 12, 2012 at 12:09pm

सनम मैं क्या लिखूँ ..... एक सुन्दर रचना बहुत बढ़िया

Comment by कवि - राज बुन्दॆली on March 11, 2012 at 10:56pm

वाह,,,,,,,,,बहुत सुन्दर निभाया है आपने,,,,,,,,,,,,

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on March 11, 2012 at 9:13pm

bahut sundar abhivyakti , badhai .

Comment by विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी on March 11, 2012 at 9:00pm
सागर जी क्या वेदना झलक रही है?एक उम्दा रचना के लिए बधाई।
Comment by संदीप द्विवेदी 'वाहिद काशीवासी' on March 11, 2012 at 6:13pm

आदरणीय प्रवीण जी,

विरह-वेदना की सशक्त अभिव्यक्ति है आपकी यह कविता| बहुत बढ़िया| आभार,


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on March 11, 2012 at 6:02pm

man ke upje bhaavon ko ek sootra me pirone ka achcha andaaj hai.

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