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अभेद्य है ये दुर्ग अभी न सेंध से प्रहार कर I
बिखेरना है धज्जियां, सत्य का तू वार कर II
                                     प्रहार कर प्रहार कर........
धन की बहुत लालसा  बिके हुए जमीर हैं.
तन के महाराज सभी  मन के ये फ़कीर हैं.
विवश  अब नहीं है तू , देख तो पुकार कर
बिखेरना है धज्जियां, सत्य का तू वार कर II
                                     प्रहार कर प्रहार कर........
                   
कौम अब पुकारती  न और इन्तजार कर,
रक्त से बलिदान के सींचित इस जमीन पर,
मिट सके भेद सभी जीवन को बलिदान कर
बिखेरना है धज्जियां, सत्य का तू वार कर II
                                     प्रहार कर प्रहार कर........

नित शाम ढले भेडिये अब झुण्ड में है आ रहे
नित कृत्य दानवों से करके कौम को लजा रहे
दूध की है लाज तुझे अब सोच ना विचार कर
बिखेरना है धज्जियां, सत्य का तू वार कर II
                                     प्रहार कर प्रहार कर........

मिट गए सिंदूर कई जो सत्य को पुकार कर
गर्व उन्हें फिरभी यहाँ इस देश को निहार कर
लानते ना दे अब  इस ढ्कोसली सरकार पर,
बिखेरना है धज्जियां, सत्य का तू वार कर II
                                     प्रहार कर प्रहार कर........

हजारों द्रष्टियां लगी इस तेरे जन करोड़ पर
गरीब रक्त बेचते यहाँ  अंग अंग मरोड़ कर
बुझ  गए है दीप कई भूख से चीत्कार कर
बिखेरना है धज्जियां, सत्य का तू वार कर                       
                    प्रहार कर प्रहार कर.....

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Comment by अरुण कान्त शुक्ला on April 14, 2012 at 11:51pm

लानते ना दे अब  इस ढ्कोसली सरकार पर,
बिखेरना है धज्जियां, सत्य का तू वार कर II

अशोक जी , सत्य ही लानतें देने का समय , समय से कुछ पूर्व ही शेष हो गया है | प्रहार ही एकमात्र रास्ता रह गया है | जब रक्त बेच बेच कर ही जीवन जीना है तो संघर्ष में रक्त का बहाना ज्यादा उचित है | प्रेरणादायी रचना | बधाई |

Comment by Ashok Kumar Raktale on March 29, 2012 at 7:43am

ब्लॉग के फीचर होने पर बधाई के लिए महिमा जी आपको धन्यवाद एवं ब्लॉग को फीचर श्रेणी में चयन के लिए सम्पादक मंडल का आभार.

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on March 28, 2012 at 8:06pm

adarniya ashok ji, sadar abhivadan.

vah sir ji pahli ball vo bhi boundry ke bahar 6 run ke liye. badhai.

Comment by राकेश त्रिपाठी 'बस्तीवी' on March 28, 2012 at 5:48pm

आदरणीय अशोक जी, सादर नमस्कार. बहुत सुन्दर रचना. एक ललकार जो सत्तायाशो के कर्ण भेद दे! इस वीर रस से ओत प्रोत रचना के लिए हार्दिक बधाई.


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on March 28, 2012 at 5:02pm

ek aujpoorn, sandesh deti hui josh ka sanchaar karti hui kavita.....atiuttam badhaai sweekaren.

Comment by MAHIMA SHREE on March 28, 2012 at 4:43pm
आदरणीय अशोक जी ,
फीचर होने केलिए...बधाई...
Comment by Ashok Kumar Raktale on March 27, 2012 at 1:05am

आदरणीय प्रदीप जी, सौरभ जी, संदीप जी और शाही जी आप  सभी गुनी जनों का आशीर्वाद प्राप्त कर प्रसन्नता हुई.धन्यवाद.

Comment by संदीप द्विवेदी 'वाहिद काशीवासी' on March 26, 2012 at 2:50pm

आदरणीय अशोक जी,

ओजस्वी शब्दों के साथ प्रवाहमय कविता से इस मंच पर आगाज़ किया आपने| स्वागत है आपका...! सादर,


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on March 25, 2012 at 8:40pm

क्या शब्द चयन और क्या प्रवाह ? गेयता के लिहाज से यह कविता छलछलाती हुई सी निकलती जाती है. ऊर्जस्विता को नसों में घोलती इस रचना के लिये भाई अशोक कुमार जी हृदय से धन्यवाद.

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on March 25, 2012 at 7:17pm

मिट गए सिंदूर कई जो सत्य को पुकार कर 
गर्व उन्हें फिरभी यहाँ इस देश को निहार कर
लानते ना दे अब  इस ढ्कोसली सरकार पर,
बिखेरना है धज्जियां, सत्य का तू वार कर II 
                                     प्रहार कर प्रहार कर........

आदरणीय अशोक जी, सादर अभिवादन. 

मिला सुर मेरा तुम्हारा , शानदार , जानदार प्रस्तुति. स्वागत है.



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