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प्यार की मीठी बातों क़े माने ग़ज़ल,..
इश्क करते है जो वो ही जाने ग़ज़ल.
**
गोया गागर में सागर समाया करे,...
चंद लफ़्ज़ों में कहती फ़साने ग़ज़ल....
**
प्यार पर ही टिका है ये सारा जहाँ,...
बात सबको लगी है बताने ग़ज़ल.....
**
रौब अपना जमाने यहाँ बज़्म में,..
छेड़ देते है यूँ  ही सयाने ग़ज़ल.....
**
चांदनी रात में देख उनकी अदा,..,
दिल मचल क़े लगा गुनगुनाने ग़ज़ल....
**
तहजीब का जब से हिस्सा बनी,...
लोग घर में लगे है सजाने ग़ज़ल....
**
...अविनाश बागडे.

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Comment

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Comment by वीनस केसरी on March 29, 2012 at 4:08pm
चांदनी रात में देख उनकी अदा,..,
दिल मचल क़े लगा गुनगुनाने ग़ज़ल....

वाह वा,
अविनाश जी इस शेर ने तो बस रोक ही लिया और देर तक गुनगुनाता रहा
प्यारी ग़ज़ल के लिए बधाई

गोया गागर में सागर समाया करे,...
चंद लफ़्ज़ों में कहती फ़साने ग़ज़ल....

वाह वाह वा...
Comment by AVINASH S BAGDE on March 28, 2012 at 7:16pm

resptd..Admin,कृपया तिलक जी द्वारा दीये गए बहुमूल्य सुझावों को  मेरे इस ब्लॉग में incorporate कर मुझे अनुग्रहित करें.

1..

प्यार की मीठी बातों क़े माने ग़ज़ल,..

इश्क करते है (करता है) जो वो ही जाने ग़ज़ल.

('करते हैं' बहुवचन है और 'जाने ग़ज़ल' एकवचन इसलिये सुधार आवश्‍यक है)

2..

तहजीब का जब से हिस्सा बनी,...(जब से (स) तहजीब का एक हिस्‍सा बनी)

लोग घर में लगे है सजाने ग़ज़ल....

Comment by AVINASH S BAGDE on March 28, 2012 at 7:11pm

बस उसे ही नसीब है अल्लाह का फ़ज़ल,.....रविन्द्र नाथ जी शुक्रिया.

Comment by AVINASH S BAGDE on March 28, 2012 at 7:09pm
बागी जी,शुक्रिया आपकी हौसला अफजाई का.. 
Comment by AVINASH S BAGDE on March 28, 2012 at 7:09pm
राजेश कुमारी जी,नीरज भाई,डॉ.प्राची जी ,रविन्द्र नाथ जी,प्रदीप कुशवाहा जी.....सभी स्नेही-जनों का ह्रदय से आभार.
Comment by AVINASH S BAGDE on March 28, 2012 at 7:04pm

Saurabh ji,

आदरणीय तिलकराज जी ने विशद चर्चा की है जो सभी के लिये अनुकरणीय है.

is me do ray nahi hai.

shukriya Saurabh ji.

Comment by AVINASH S BAGDE on March 28, 2012 at 7:03pm

"आशा है अन्‍यथा नहीं लेंगे।"

तिलकराज जी ,ओ.बी.ओ. परिवार के एक सदस्य और वो भी जिसे इस परिवार ने हमेशा ही कुछ सिखाया है उसे ही आप हक से कुछ बोल पाए...
अन्यथा किसी को भी आप ये अमूल्य ज्ञान क्यों बाँटते
आपका अंदाज़ दिल को छू गया.
यही आकर ओ.बी.ओ. की सार्थकता सिद्ध होती है...
आपका 
अविनाश..

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on March 28, 2012 at 8:04am

vaah kya khoob kahi hai ghazal...daad kabool karen.


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on March 27, 2012 at 10:09pm

भाई अविनाशजी, आपकी ग़ज़ल के लिये आपको हार्दिक बधाइयाँ.

आदरणीय तिलकराज जी ने विशद चर्चा की है जो सभी के लिये अनुकरणीय है.  सादर.


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Tilak Raj Kapoor on March 27, 2012 at 9:33pm

आपकी इस ग़ज़ल के अरकान हैं: फ़ायलुन्, फ़ायलुन्, फ़ायलुन्, फ़ायलुन्  या 212, 212, 212, 212

कुछ मामूली सुझाव हैं:

प्यार की मीठी बातों क़े माने ग़ज़ल,..

इश्क करते है (करता है) जो वो ही जाने ग़ज़ल.

('करते हैं' बहुवचन है और 'जाने ग़ज़ल' एकवचन इसलिये सुधार आवश्‍यक है)

**

गोया गागर में सागर समाया करे,...

चंद लफ़्ज़ों में कहती फ़साने ग़ज़ल....

**

प्यार पर ही टिका है ये सारा जहाँ,...

बात सबको लगी है बताने ग़ज़ल.....

**

रौब अपना जमाने यहाँ बज़्म में,..

छेड़ देते है यूँ ही सयाने ग़ज़ल.....

**

चांदनी रात में देख उनकी अदा,..,

दिल मचल क़े लगा गुनगुनाने ग़ज़ल....

**

तहजीब का जब से हिस्सा बनी,...(जब से (स) तहजीब का एक हिस्‍सा बनी)

लोग घर में लगे है सजाने ग़ज़ल....

बाकी अशआर में जहॉं आपने वज्‍़न गिराया है ठीक है लेकिन तहजीब के 'जी' में वज्‍़न गिराना संभव नहीं है इसलिये इस शब्‍द को ऐसी जगह रखना पड़ेगा जहॉं बह्र में समा जाये। बदले रूप में 'से' गिराकर 'स' पढ़ा जा सकता है।

आशा है अन्‍यथा नहीं लेंगे।

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