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कौन हूँ मैं... ??

कौन हूँ मैं... 
_______

आज फिर से वो ही ख्याल आया हैं,
आत्मा से उभर के एक सवाल आया हैं,
कि मैं कौन हूँ...??
कौन हूँ मैं... ?

हैं रंगमंच जो दुनिया ये,
क्यूँ अपने किरदार को भूल रहा,
जीना था औरो की खातिर,
क्यूँ अपने दुखों में झूल रहा,
क्यूँ मुझमें हैं अनबुझी प्यास,
क्यूँ खुशियों को मैं ढूँढ रहा,
अनभिज्ञ हूँ मौन हूँ...
आखिर मैं कौन हूँ...??


मन के अन्दर कोई प्यास नहीं,
अंतस फिर भी अतृप्त क्यों,
सपनों में ये संलिप्त है क्या, 
भीगी पलकें ये पीर है क्यों,
क्या ये सब भी इक ढोंग बस, 
क्या खोटा है मेरा मानस,
हैरान हूँ मौन हूँ..
आखिर मैं कौन हूँ...??
कौन हूँ मैं... ??

बस चाहूँ जीव हित बहूँ नदिया सा,
खिल जाऊँ ,महकूँ बगिया सा,
पर क्या चाह ही अनमोल है,
प्रयाण बिना पथ का क्या मोल है..
रीत रही प्रतिपल जीवन गगरी,
बढ़ रही निरंतर प्रश्न वल्लरी,
अनुत्तरित हूँ मौन हूँ..
आखिर मैं कौन हूँ...?

.
प्रवीण कुमार पर्व

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Comment

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Comment by praveen on April 28, 2012 at 1:41pm

Ambarish Srivastava जी  और vandana gupta जी सराहना हेतु अत्यंत कृतज्ञ हूँ..


Comment by Er. Ambarish Srivastava on April 27, 2012 at 2:05pm

//बस चाहूँ जीव हित बहूँ नदिया सा,
खिल जाऊँ ,महकूँ बगिया सा,
पर क्या चाह ही अनमोल है,
प्रयाण बिना पथ का क्या मोल है..
रीत रही प्रतिपल जीवन गगरी,
बढ़ रही निरंतर प्रश्न वल्लरी,
अनुत्तरित हूँ मौन हूँ..
आखिर मैं कौन हूँ...?//

प्रवीण जी, बड़ी ही ईमानदारी व सहजता से स्वयं से किये गए प्रश्न बहुत ही सटीक हैं ! आदरणीय  बागी जी ने सत्य ही कहा है कि स्वयम को खोज पाना ही जीवन की सार्थकता है ! भाव व शिल्प की दृष्टि से यह रचना बहुत सशक्त है ! हार्दिक बधाई मित्रवर !

Comment by praveen on April 25, 2012 at 9:09pm

 CHOTU SINGH जी,  MAHIMA SHREE जी,  Ganesh Jee "Bagi" जी, Arun Kumar Pandey 'Abhinav' जी,satish mapatpuri जी,  आशीष यादव जी, Seema दीदी,  SHAILENDRA KUMAR SINGH 'MRIDU' जी, PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA जी...
मेरी प्रथम रचना को आप लोगो ने जो मान दिया हैं..इससे मैं अभिभूत हूँ !! और इस सम्मान के लिये अत्यंत कृतज्ञ हूँ..!! मैं अभी लेखन विधा में बहुत छोटा हूँ आप सब से अत: सविनय निवेदन हैं कि आदरणीय जैसे शब्दों से संबोधित न करें...

Comment by MAHIMA SHREE on April 25, 2012 at 3:23pm
रीत रही प्रतिपल जीवन गगरी,
बढ़ रही निरंतर प्रश्न वल्लरी,
अनुत्तरित हूँ मौन हूँ..
आखिर मैं कौन हूँ...?

आदरणीय प्रवीन जी , नमस्कार ,
वाह बहुत ही सुंदर और गहन अभिवयक्ति ...
बधाई स्वीकार करें

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on April 25, 2012 at 1:56pm

आदरणीय प्रवीण जी, स्वयम को खोज पाना ही जीवन की सार्थकता है, मैं कौन हूँ ....इसी प्रश्न में हम सभी उलझे है, शानदार अभिव्यक्ति पर बधाई स्वीकार करें महोदय |

Comment by Abhinav Arun on April 25, 2012 at 6:45am

क्यूँ अपने दुखों में झूल रहा,
क्यूँ मुझमें हैं अनबुझी प्यास,
क्यूँ खुशियों को मैं ढूँढ रहा,
अनभिज्ञ हूँ मौन हूँ...
आखिर मैं कौन हूँ...??

आदरणीय श्री प्रवीन जी हार्दिक बधाई इस सशक्त रचना पर !! आपने अंतर में घुमड़ते प्रश्न को अत्यंत प्रभावी ढंग से उकेरा है इस रचना में हार्दिक शुभकामनाएं भी !!




Comment by satish mapatpuri on April 25, 2012 at 1:27am

आत्म मंथन कराती इस खुबसूरत रचना के लिए बधाई प्रवीण जी

Comment by आशीष यादव on April 24, 2012 at 11:58pm
इस सांसारिक मञ्च पर कभी हम खुद को कठपुतली (भाग्य भारोसिक) मानते हैँ तो कभी स्वयँरचित स्कृप्ट (कर्म) पर पात्र बन मञ्चन करने वाला। रचनाकार इन प्रश्नो को रखना चाहा है।
एक सफल रचना हेतु बधाई
Comment by CA (Dr.)SHAILENDRA SINGH 'MRIDU' on April 24, 2012 at 11:09pm

"अपने आप को जानो" का सन्देश संप्रेषित करती कृति पर ह्रदय से बधाई स्वीकार करें आदरणीय प्रवीण जी

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on April 24, 2012 at 11:07pm

बस चाहूँ जीव हित बहूँ नदिया सा,
खिल जाऊँ ,महकूँ बगिया सा,

adarniya pravin ji, sadar. bahut sundar vichar, sundar rachna, prshn. badhai. 

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