मैं हूँ स्वछन्द ,नीर की बदरी, जहां चाहे बरस जाऊँगी
मैं कोई धागा तो नहीं, जो सुई के पीछे आऊँगी |
मैं हूँ मस्त पवन कि खुशबू, जहां चाहे बिखर जाऊँगी
मैं कोई काजल तो नहीं, जो पलकों में सिमट जाऊँगी |
मैं हूँ उन्मुक्त सशक्त पतंग, उच्च गगन लहराऊँगी
मैं कोई मैना तो नहीं, जो पिंजरे बीच कैद हो जाऊँगी |
मैं हूँ पाषाण हिय कि नारी, अपनी क्षमता दिखलाऊंगी
मैं कोई शुष्क लकड़ी तो नहीं, जो आरी से कट जाऊँगी |
मैं हूँ आज की शिक्षित नारी, कभी न शीश झुकाउँगी
नारी अबला होती है यह, प्रचलित कथन मिटाऊँगी |
Comment
आदरणीय राजेश कुमारी जी, सादर अभिवादन , एक एक लाइन dradh ichha shakti को प्रदर्शित करती हुई. सहमत. बधाई
बहुत बहुत हार्दिक आभार प्राची जी रचना के भावों की सराहना हेतु
आवश्यक सूचना:-
1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे
2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |
3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |
4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)
5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |
© 2025 Created by Admin.
Powered by
महत्वपूर्ण लिंक्स :- ग़ज़ल की कक्षा ग़ज़ल की बातें ग़ज़ल से सम्बंधित शब्द और उनके अर्थ रदीफ़ काफ़िया बहर परिचय और मात्रा गणना बहर के भेद व तकतीअ
ओपन बुक्स ऑनलाइन डाट कॉम साहित्यकारों व पाठकों का एक साझा मंच है, इस मंच पर प्रकाशित सभी लेख, रचनाएँ और विचार उनकी निजी सम्पत्ति हैं जिससे सहमत होना ओबीओ प्रबन्धन के लिये आवश्यक नहीं है | लेखक या प्रबन्धन की अनुमति के बिना ओबीओ पर प्रकाशित सामग्रियों का किसी भी रूप में प्रयोग करना वर्जित है |
You need to be a member of Open Books Online to add comments!
Join Open Books Online