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कुण्डलिया (एक प्रयास)
 
 
आँखों में सपने सजा, होंठों पर मुस्कान
साजन औ सजनी चले, प्रेम डगर अंजान
प्रेम डगर अंजान, संग हों जीवन साथी
रौशन हर इक राह, बने जो दीपक बाती    
नैया होती पार, भले हो तूफाँ लाखों
निष्ठा और कर्तव्य, बसे हों जिनकी आँखों....

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प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on May 17, 2012 at 3:50pm

//प्रेम डगर अंजान, संग हों जीवन साथी
रौशन हर इक राह, बने जो दीपक बाती  //

.

वाह वाह - क्या कहने हैं डॉ प्राची जी, बहुत सुन्दर कुंडलिया छंद कहा है। रोला की उपरोक्त पंक्तियाँ तो सीधे दिल में उतर जाती हैं। हार्दिक बधाई स्वीकार करें।



सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on May 17, 2012 at 3:15pm
Hadik abhaar Dr. Surya Bali Ji
Comment by डॉ. सूर्या बाली "सूरज" on May 17, 2012 at 2:44pm

डॉ प्राची आप इतनी सुंदर अभिव्यक्ति के लिए मेरी  बधाई स्वीकार करें ! बिलकुल सच कहा है आपने प्रेम दीपक बाती की तरह ही होना चाहिए ....

कृपया ध्यान दे...

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