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सुग्गे!!!..............(लघुकथा)

सुग्गे!!!

(लघुकथा)
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रोज की तरह आज भी रमेश सायकल पर सुग्गों  के पिंज़रे लटका कर बेचने के लिये निकला.आज की धूप सुबह से ही चिलचिलाती सी थी.
दिनभर आवाज लगा-लगा कर रमेश का गला सूखा जा रहा था.पूरब की लाली धीरे-धीरे पश्चिम के आकाश को लाल करने लगी थी मगर एक भी सुग्गे की बिक्री का संयोग रमेश के भाग में नहीं आया.धूप से बेहाल,थक कर चूर, रमेश सुग्गों के पिंज़रों से भरी सायकल एक पेड़ से टिका कर बैठ गया.....
थोड़ी देर बाद राह चलते लोगो का ध्यान गया.लोगो ने देखा की पिंज़रे में रखे सुग्गे फड-फड़ा रहे थे और रमेश के शरीर का पिंजरा अपने सुग्गे के बिना सूना पड़ा था!!!!!
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अविनाश बागडे.

Views: 426

Comment

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Comment by Albela Khatri on June 15, 2012 at 9:00am

वाह वाह  अविनाश बागडे जी,
गागर में सागर का  आभास कराती इस बहुत ही मार्मिक  लघु-कथा  'सुग्गे' के लिए आपका अभिनन्दन
__बधाई

Comment by AVINASH S BAGDE on June 13, 2012 at 6:49pm

aabhar....Yogi Saraswat ji

              PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA  ji.

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on June 12, 2012 at 3:10pm

चल उड़ जा रे पंछी तेरा देश हुआ बेगाना 

सुन्दर कथानक प्रस्तुतीकरण पे दिल हुआ दीवाना 

बधाई.

Comment by Yogi Saraswat on June 12, 2012 at 10:31am

ये जो इंसान है , ये कभी कभी इतना कमज़ोर मालूम होता है जैसे इसके बस का कुछ नहीं ! मार्मिक कथा , बेहतरीन !

Comment by AVINASH S BAGDE on June 12, 2012 at 10:17am
Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on June 12, 2012 at 9:14am

achhi katha .........bahut saare saar samete hue hai ...........

Comment by UMASHANKER MISHRA on June 11, 2012 at 11:19pm

अत्यंत छोटी कथा पर दिल में दर्द का तूफान ला दी

रमेश के शरीर का पिंजरा अपने सुग्गे के बिना सूना पड़ा था!!!!!

Comment by अरुण कान्त शुक्ला on June 11, 2012 at 8:32pm

अविनाश भाई , कथा अच्छी है . बधाई .

कृपया ध्यान दे...

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