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शब्-ए-फुरकत है उजालों की जरुरत क्या है

शब्-ए-फुरकत है उजालों की जरुरत क्या है
पास तुम हो तो इशारों की जरुरत क्या है

तुम बसे हो जो बने नूर-ए-खुदा आँखों में
इन निगाहों को नजारों की जरुरत क्या है

दिल लुटे सबके नज़र उसपे पड़ी जैसे ही
बेचने दिल ये बाजारों की जरुरत क्या है

छोड़ के तुम जो चले मिलने लगे सब हमसे
हिज्र के गम में विसालों की जरुरत क्या है

फूल खिलते हैं बहारों में हरी साखों पर
खार खिलने को बहारों की जरुरत क्या है

साथ जो छोड़ा मेरा तुमने सरे मंजिल ही
तब तेरे ख्वाबों ख्यालों की जरुरत क्या है

बेबफा था वो तुझे देता रहा धोखा ही
"दीप" तुमको यूँ मलालों की जरुरत क्या है

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Comment

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Comment by Nilansh on June 15, 2012 at 8:07pm

तुम बसे हो जो बने नूर-ए-खुदा आँखों में 
इन निगाहों को नजारों की जरुरत क्या है

 

bahut hi sunder ghazal aadarniya bhai sandeep ji

bahut badhaai

Comment by yogesh shivhare on June 15, 2012 at 6:34pm

बहुत सुन्दर ग़ज़ल आदरणीय संदीप जी ..बधाई

छोड़ के तुम जो चले मिलने लगे सब हमसे
हिज्र के गम में विसालों की जरुरत क्या है
बेहद खूबसूरत अल्फाजों से सजी उम्दा रचना

Comment by Albela Khatri on June 15, 2012 at 11:49am

वाह वाह संदीप कुमार जी.......
बहुत अच्छी  ग़ज़ल..........

तुम बसे हो जो बने नूर-ए-खुदा आँखों में
इन निगाहों को नजारों की जरुरत क्या है

___बधाई !

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on June 15, 2012 at 11:05am

आदरणीय संदीप जी , सादर 

अब तक की बेहतरीन गजल. बधाई.

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