For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

अब दीप मुल्के इश्क में उन्माद चाहिए

रो मत अरे नादां नहीं ये आब चाहिए
दुनिया बदलने को दिलों में आग चाहिए

दहशत मिटे वहशत मिटे इस मुल्क से मेरे
बिस्मिल,भगत,अशफाक औ आज़ाद चाहिए

लड़ने बुराई से मिटाने गर्दिश-ए-वतन
चट्टान सा तन औ जिगर फौलाद चाहिए

उजड़ा चमन है मुल्क ये बंजर जमीं हुई
सींचो लहू गर ये चमन आबाद चाहिए

क्या शांति से होगा भला लाठी मिले अगर
अब दीप मुल्के इश्क में उन्माद चाहिए


संदीप पटेल "दीप"

Views: 548

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by डॉ. सूर्या बाली "सूरज" on June 12, 2012 at 7:12pm

दहशत मिटे वहशत मिटे इस मुल्क से मेरे ,बिस्मिल,भगत,अशफाक औ आज़ाद चाहिए.....वाह संदीप भाई क्या शेर है। मज़ा आ गया। वैसे तो पूरी ग़ज़ल ही बहुत खूबसूरत है लेकिन इस शेर का जवाब नहीं !! दाद कुबूल करें!!

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on June 12, 2012 at 3:12pm

आदरणीय संदीप जी, सादर 

बिलकुल सही फरमाया है आपने. बधाई.

Comment by Yogi Saraswat on June 12, 2012 at 10:38am

उजड़ा चमन है मुल्क ये बंजर जमीं हुई
सींचो लहू गर ये चमन आबाद चाहिए

क्या शांति से होगा भला लाठी मिले अगर
अब दीप मुल्के इश्क में उन्माद चाहिए

जोश जगाती बेहतरीन ग़ज़ल !

Comment by Arun Sri on June 12, 2012 at 10:23am

उजड़ा चमन है मुल्क ये बंजर जमीं हुई
सींचो लहू गर ये चमन आबाद चाहिए

बहुत बढ़िया सर जी !


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on June 12, 2012 at 10:01am

bahut sundar aujpoorn ghazal....vaah

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on June 12, 2012 at 9:20am

aap sabhi aadarneey jano @AVINASH S BAGDE sir ji , @अरुण कान्त शुक्ला sir ji , @yogesh shivhare ji , kaa hriday se shukriya aur saadar aabhar

Comment by yogesh shivhare on June 11, 2012 at 9:14pm

लड़ने बुराई से मिटाने गर्दिश-ए-वतन
चट्टान सा तन औ जिगर फौलाद चाहिए  

बहुत सुन्दर रचना वीर रस में सनी हुई .बधाई

Comment by अरुण कान्त शुक्ला on June 11, 2012 at 8:34pm

दुनिया बदलने को दिलों में आग चाहिए... बधाई .

Comment by AVINASH S BAGDE on June 11, 2012 at 7:58pm


दहशत मिटे वहशत मिटे इस मुल्क से मेरे 

बिस्मिल,भगत,अशफाक औ आज़ाद चाहिए ...aaha ha..kya tewar hai kavita ke wah! Sandeep bhai wah!

लड़ने बुराई से मिटाने गर्दिश-ए-वतन 
चट्टान सा तन औ जिगर फौलाद चाहिए 

 

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Blogs

Latest Activity

लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-182
"आ. भाई सुशील जी , सादर अभिवादन। प्रदत्त विषय पर सुंदर दोहा मुक्तक रचित हुए हैं। हार्दिक बधाई। "
Sunday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-182
"आदरणीय अजय गुप्ताअजेय जी, रूपमाला छंद में निबद्ध आपकी रचना का स्वागत है। आपने आम पाठक के लिए विधान…"
Sunday
Sushil Sarna replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-182
"आदरणीय सौरभ जी सृजन के भावों को आत्मीय मान से अलंकृत करने का दिल से आभार आदरणीय जी ।सृजन समृद्ध हुआ…"
Sunday
Sushil Sarna replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-182
"आदरणीय सौरभ जी सृजन आपकी मनोहारी प्रतिक्रिया से समृद्ध हुआ । आपका संशय और सुझाव उत्तम है । इसके लिए…"
Sunday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-182
"  आदरणीय सुशील सरना जी, आयोजन में आपकी दूसरी प्रस्तुति का स्वागत है। हर दोहा आरंभ-अंत की…"
Sunday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-182
"  आदरणीय सुशील सरना जी, आपने दोहा मुक्तक के माध्यम से शीर्षक को क्या ही खूब निभाया है ! एक-एक…"
Sunday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' posted a blog post

देवता क्यों दोस्त होंगे फिर भला- लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"

२१२२/२१२२/२१२ **** तीर्थ  जाना  हो  गया  है सैर जब भक्ति का हर भाव जाता तैर जब।१। * देवता…See More
Sunday
अजय गुप्ता 'अजेय replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-182
"अंत या आरंभ  --------------- ऋषि-मुनि, दरवेश ज्ञानी, कह गए सब संतहो गया आरंभ जिसका, है अटल…"
Jan 17
Sushil Sarna replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-182
"दोहा पंचक  . . . आरम्भ/अंत अंत सदा  आरम्भ का, देता कष्ट  अनेक ।हरती यही विडम्बना ,…"
Jan 17
Sushil Sarna replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-182
"दोहा मुक्तक. . . . . आदि-अन्त के मध्य में, चलती जीवन रेख ।साँसों के अभिलेख को, देख सके तो देख…"
Jan 17
vijay nikore commented on vijay nikore's blog post सुखद एकान्त है या है अकेलापन
"नमस्ते, सुशील जी। आप से मिली सराहना बह्त सुखदायक है। आपका हार्दिक आभार।"
Jan 17
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा एकादश. . . . . पतंग

मकर संक्रांति के अवसर परदोहा एकादश   . . . . पतंगआवारा मदमस्त सी, नभ में उड़े पतंग । बीच पतंगों के…See More
Jan 14

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service