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माज़रा क्या है? (कुछ सवालो कि दुनिया में चला जाए)

सदा हिजाब में रहते हो माज़रा क्या है?
बड़े रुबाब में रहते हो माज़रा क्या है?


बना दिया आखिर मुझे गुलशन पसंद....
हरेक गुलाब में रहते हो माज़रा क्या है?

हुदूद कोई बना लो हुस्न-ए-शबनम की....
खुले शबाब में रहते हो माज़रा क्या है?

कभी दुआ कभी मुराद में महसूस किया....
कभी अज़ाब में रहते हो माज़रा क्या है?

शकाफत भरा है तुम्हारा कोहिनूर बदन....
हया-ओ-आब में रहते हो माज़रा क्या है?

जबसे दीदार किया नींद है नसीब कहा....
क्यों मेरे ख्वाब में रहते हो माज़रा क्या है?

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Comment

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Comment by Kedia Chhirag on April 14, 2013 at 8:10pm

अत्यंत सुंदर ...

Comment by अरुन 'अनन्त' on July 5, 2012 at 4:24pm

वाह बहुत खूब


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on July 5, 2012 at 10:45am

एक शरारत भरी नटखट सी ग़ज़ल ---बहुत सुन्दर 

Comment by Yogi Saraswat on July 4, 2012 at 4:56pm

जबसे दीदार किया नींद है नसीब कहा....
क्यों मेरे ख्वाब में रहते हो माज़रा क्या है?

 बहुत खूब

Comment by Rekha Joshi on July 4, 2012 at 11:58am

राज जी ,

बना दिया आखिर मुझे गुलशन पसंद....
हरेक गुलाब में रहते हो माज़रा क्या है?बहुत खूब ,बढ़िया गजल ,बधाई 
Comment by आशीष यादव on July 4, 2012 at 1:23am

बड़ी ही बेहतरीन गजल सर जी। वाह आखिर माजरा क्या है।
बधाई हो।

Comment by UMASHANKER MISHRA on July 3, 2012 at 11:03pm

जबसे दीदार किया नींद है नसीब कहा....
क्यों मेरे ख्वाब में रहते हो माज़रा क्या है?..बढ़िया गज़ल है. राज भाई साहब ये सात लाजवाब प्रश्न माज़रा  क्या है ?

माज़रे में बढ़िया  शरारत भरी है .माज़रा क्या है ?

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