आदमी को कर रहा है, तंग आदमी,
सभ्यता सीखा गया बे-ढंग आदमी,
कोशिशें कर-2 हुआ है, कामयाब अब,
आसमां में भर रहा है, रंग आदमी,
देख के लो हो गयीं, हैरान अंखियाँ,
ओढ़ बैठा है, बुरा फिर अंग आदमी,
सोंच के ना काम कोई आज तक किया,
जी रहा इन्हीं आदतों के, संग आदमी,
दूसरों के दुःख को हरदिन, बढाता था,
हाल अपना जान अब है, दंग आदमी............
Comment
आदरणीय भ्रमर जी बहुत - बहुत शुक्रिया. आप स्नेह मिला आभार.
योग्यता जी शुक्रिया
आदरणीय अशोक जी बिलकुल ठीक कहा है आपने.
दूसरों के दुःख को हरदिन, बढाता था,
हाल अपना जान अब है, दंग आदमी............
अरुण जी सुविचार ...काश इस का ध्यान रख भी हम सुधरें कल आप के ब्लॉग पर भी पहुंचा बहुत सुन्दर लगा
अरुण जी
सादर,
सोच के ना काम कोई आज तक किया,
जी रहा इन्हीं आदतों के, संग आदमी.
यही तो वन डे लाइफ स्टाइल है. रन आने से मतलब, शोट सही था या गलत,क्या करना.सुन्दर रचना. बधाई.
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