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मैं शून्य का उपासक हूँ

मैं शून्य का उपासक हूँ
मुझे मेले में भी सब अकेले लगते हैं
इसीलिए सबसे मिल के हँस बोल लेता हूँ
न जाने हंगाम के हंगामे में
कब मुझे मेरा इष्ट (खुदा) मिल जाए
मुकम्मल रास्ते इख्तियार करता हूँ
मंजिल तक जाने के लिए
हर बार सोचता हूँ
ये सही है हाँ ये सच में सही है
चल देता हूँ
सारी शब् चलता हूँ
ठोकरें खाता
सम्हलता
चाँद की रौशनी तक नहीं भाति मुझे 
तारों से इर्ष्या करता हूँ
चिल्लाता हूँ
एक दिन देखना मैं आऊंगा
तब तुमको बताऊंगा
हँस लो
काले बादल मुझे अच्छे लगते हैं
वही तो बरसते हैं
कपास की तरह दूधिया बादल
बस देखने के खूबसूरत
एक बूँद ठंडक न दी कभी
बस ललचा गए
छा गए दिमाग में
अमावश बेहतर होती है
एक दम अकेला होता हूँ
मार्ग वीरान होता है
आने वाले तूफ़ान से बेफिक्र
कुछ भी नहीं दिखता
सिवाए चलने के
सहर होते ही रुक जाता हूँ
क्यूंकि मुझे एकाकी रहना भाता है
और सुबह होते ही
एक साया है जो मेरा पीछा नहीं छोड़ता
निरंकुश है
कहना मानता ही नहीं
कभी आगे कभी पीछे
कभी दायें कभी बाएं
छी ..........ध्यान भंग कर देता है
शून्य की उपासना में खलल डाल देता है
मेरा इष्ट दूर हो जाता है
रात भर की खोज
सुबह होते ही
फिर मजबूर कर देती है
नए रास्ते की तलाश के लिए
लेकिन मंजिल एक ही है
रास्ता दुर्गम और सहज दोनों ही

 
संदीप पटेल "दीप"

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Comment by Ashok Kumar Raktale on July 28, 2012 at 6:46pm

बहुत खूब संदीप जी.

Comment by Rekha Joshi on July 27, 2012 at 10:40pm

एक दम अकेला होता हूँ 
मार्ग वीरान होता है 
आने वाले तूफ़ान से बेफिक्र 
कुछ भी नहीं दिखता 
सिवाए चलने के 
सहर होते ही रुक जाता हूँ 
क्यूंकि मुझे एकाकी रहना भाता है ,सदीप जी ,अति सुंदर भाव लिए हुए रचना ,बधाई 

Comment by अरुन 'अनन्त' on July 27, 2012 at 3:32pm

वाह बेहतरीन बहुत उम्दा संदीप बधाई.....

Comment by Albela Khatri on July 27, 2012 at 3:19pm

जय हो संदीप जी........

एक साया है जो मेरा पीछा नहीं छोड़ता
निरंकुश है
कहना मानता ही नहीं
कभी आगे कभी पीछे
कभी दायें कभी बाएं
छी ..........ध्यान भंग कर देता है

__क्या बात है

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