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किसान,
प्रतीक अथक श्रम के
अतुल्य लगन के ;
प्रमुख स्तंभ
भारतीय अर्थव्यवस्था के,
मिट्टी से सोना उगानेवाले
आज उपेक्षित हैं
परित्यक्त हैं
अपने ही "कर्जदारों" द्वारा
चुनी सरकारों द्वारा ;
फंसे हैं मकड़जाल में
महाजनों, सूदखोरों,
बिचौलियों के,
जा चुके हैं हाशिये पर
एक कृषिप्रधान देश में
बदलते परिवेश में ;
क्षुधा-संग्राम हेतु
शस्त्र बनाने वाले,
स्वयं निःशस्त्र हैं
अवसाद से त्रस्त हैं ;
विवश हैं
आत्महत्या के लिए,
कृषि छोड़ने के लिए,
आवश्यकता है
स्थिति सुधारने की,
उन्हें उबारने की ;
अन्यथा
देर हो जाएगी
बहुत देर...|

 

(नोट - चूंकि किसान का कर्जदार पूरा देश होता है, इसी मायने में "कर्जदार" शब्द का प्रयोग किया गया है)

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Comment

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Comment by कुमार गौरव अजीतेन्दु on August 5, 2012 at 8:08pm

रचना को पसंद करने के लिए आपका हार्दिक आभार आदरणीय अरुण सर........


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by अरुण कुमार निगम on August 5, 2012 at 6:40pm

क्षुधा-संग्राम हेतु
शस्त्र बनाने वाले,
स्वयं निःशस्त्र हैं ||

सराहनीय पंक्तियाँ. एक सार्थक रचना हेतु बधाई स्वीकार करें |

Comment by कुमार गौरव अजीतेन्दु on August 5, 2012 at 5:50pm

रचना पसंद करने के लिए आपका हार्दिक आभार आदरणीय सुरेन्द्र जी.....जय श्री राधे....

Comment by कुमार गौरव अजीतेन्दु on August 5, 2012 at 5:49pm

वैचारिक समर्थन के लिए आपका हार्दिक आभार रक्ताले सर.........

Comment by कुमार गौरव अजीतेन्दु on August 5, 2012 at 5:48pm

आपका बहुत-बहुत धन्यवाद आदरणीय लक्ष्मण सर.......

Comment by SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR on August 5, 2012 at 1:01am

क्षुधा-संग्राम हेतु
शस्त्र बनाने वाले,
स्वयं निःशस्त्र हैं
अवसाद से त्रस्त हैं ;
विवश हैं
आत्महत्या के लिए,

प्रिय अजीतेंदु जी ...काश ये हमारे किसान का दर्द हमारी सरकार और विकास को गति देने वालों के आँखों में भी नजर आती 

सुन्दर रचना ..जय जवान जय किसान 
.जय श्री राधे .....भ्रमर ५ 

 

Comment by Ashok Kumar Raktale on August 5, 2012 at 12:03am

गौरव जी        

          मिट्टी से सोना उगानेवाले
आज उपेक्षित हैं
परित्यक्त हैं
अपने ही "कर्जदारों" द्वारा
चुनी सरकारों द्वारा ;
फंसे हैं मकड़जाल में
महाजनों, सूदखोरों,
बिचौलियों के,
जा चुके हैं हाशिये पर

किसानो कि पीड़ा को शब्दों के सहारे सब के सामने लाने के लिए आभार.

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on August 4, 2012 at 6:38pm

मिटटी से सोना उगाने वाले आज उपेक्षित है, अपने ही कर्जदारों द्वाराऔर चुनी हुई सरकारों द्वार आज उपेक्षित है,

अवसाद से त्रस्त है, विवश है |कुमार गौरव अजितेंदुजी, इसका हम सभी को अवसाद है | इस पर लोगो का ध्यान

आकृष्ट करने हेतु रची कविता हेतु बधाई |

Comment by कुमार गौरव अजीतेन्दु on August 4, 2012 at 5:51pm

आदरणीया रेखा जी, आपका हार्दिक आभार.......कृषि की उपेक्षा के दुष्परिणामों को सरकार जिस तरह से नजरअंदाज कर रही है वो किसानों के मन में एक आक्रोश को जन्म दे रहा है.......जिसके परिणाम घातक हो रहे हैं.....लेकिन सरकार है की समझने का नाम नहीं ले रही......

Comment by कुमार गौरव अजीतेन्दु on August 4, 2012 at 5:45pm

उत्साहवर्धन के लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद आदरणीय सौरभ सर........

कृपया ध्यान दे...

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