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बुजुर्गों के पाँव तले जन्नत का आभास होता है 

सभी रिश्तों में उनसे रिश्ता बहुत खास होता है 

जिस घर में मात कौशल्या दशरथ तात नहीं होते

वो  अपना घर नहीं होता वहां वनवास होता है 

क्यूँ भूलते हम अपना जीवन उनके ही  दम से है 

उनके बिना  तो घर का आँगन भी उदास होता है 

तमस के साए पनपते हैं वहां उनके अनादर से     

उनकी ख़ुशी से घर के हर कोने में उजास होता   

जहां वृद्धों का हो निरादर छत वो सुरक्षित है कहाँ   

उनकी चरण वंदना में देवों का वास होता है 

             **********  

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on September 3, 2012 at 9:01am

कपूर रस्तोगी जी बहुत बहुत हार्दिक आभार आपका 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on August 11, 2012 at 9:09pm

हार्दिक आभार प्रिय संदीप कुमार पटेल जी जिसने इस सच्चाई को समझ लिया वहां वृद्धाश्रम जैसी संस्थाओं की जरूरत नहीं होगी हमारी आधुनिक पीढ़ी इस सच्चाई से भटक रही है इसी लिए ये भाव रचना के रूप में उभरे 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on August 11, 2012 at 9:05pm

हार्दिक आभार रेखा जी आपको रचना पसंद आई 

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on August 11, 2012 at 2:07pm

बहुत सुन्दर बात कही है आदरणीया आपने चाँद पंक्तियों में सारतत्व कह डाला है इस जीवन का जिससे लोग जानबूझ कर दूर होते जा रहे हैं
आत्मसुख की खोज में भटक रहे हैं सर्वसुख की परिपाटी को भुला चुके हैं
साधुवाद इस रचना के लिए आपको
स्नेह भरा ये आशीष यूँ ही लुटाते रहिये

Comment by Rekha Joshi on August 11, 2012 at 1:56pm

जहां वृद्धों का हो निरादर छत वो सुरक्षित है कहाँ   

उनकी चरण वंदना में देवों का वास होता है ,बुजुर्गों को समर्पित इस सुंदर रचना पर बहुत बहुत बधाई आदरणीय राजेश जी 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on August 11, 2012 at 1:28pm

कुमार गौरव अजीतेंदु  जी रचना पसंद आई हार्दिक आभार 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on August 11, 2012 at 1:27pm

प्रिय प्राची जी हार्दिक आभार रचना को सराहने हेतु 

Comment by कुमार गौरव अजीतेन्दु on August 11, 2012 at 12:54pm
वाह राजेश जी, बहुत ही सुन्दर और शिक्षाप्रद रचना। हार्दिक बधाई।

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on August 11, 2012 at 11:53am

बुजुगों को समर्पित इस रचना हेतु हार्दिक साधुवाद आदरणीया राजेश कुमारी जी.

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