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तुम्हारे क़दमों के नीचे
सूखे हुए पत्तों की
चरमराहट ने भेज दिया
संदेसा,
छुप गई
मृगनयनी कोमल
लताओं की ओट में
अपलक निहारने लगी
तुम्हारा ओजपूर्ण लावण्य
काँधे पर तरकश
हाथ में तीर लेकर
ढूंढ रहे थे तुम अपना
शिकार
दरख़्त से
लिपटी हुई लताओं
के खिसकने की
आवाज के साथ
तुमने कुछ खिलखिलाहट
महसूस की
तुमने झाँक कर देखा
ढलते हुए सूरज की
सुर्ख लाल किरणों के
तीर उसकी आँखों को बींध गए
मानो दो दीये प्रज्ज्वलित हो उठे वहां
उस मृगनयनी आँखों में
और तुम अपलक देखते ही रह गए
समझ नहीं पाए तुम
कि शिकार तुम्हारा
दिल हो चुका था
पल में तुम्हारा दंभ
चकनाचूर हो गया
क्षणभर में एक गर्वित शिकारी
कब भिक्षुक बन बैठा
पता ही ना चला

*************

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Comment by SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR on August 16, 2012 at 6:32pm

लिपटी हुई लताओं 
के खिसकने की 
आवाज के साथ 
तुमने कुछ खिलखिलाहट 
महसूस की 
तुमने झाँक कर देखा 
ढलते हुए सूरज की
सुर्ख लाल किरणों के
तीर उसकी आँखों को बींध गए
मानो दो दीये प्रज्ज्वलित हो उठे वहां 
उस मृगनयनी आँखों में 

आदरणीया राजेश कुमारी जी  ...बहुत ही प्यारी उड़ान कल्पना में कहाँ से कहाँ पहुँच गयीं आप सुन्दर प्रणय भाव भरी रचना .बधाई ...

भ्रमर ५ 

 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on August 16, 2012 at 3:33pm

हार्दिक आभार राज नवाद्वी जी आपको रचना पसंद आई 

Comment by राज़ नवादवी on August 16, 2012 at 3:25pm

तुम्हारे क़दमों के नीचे 

सूखे हुए पत्तों की 

चरमराहट ने भेज दिया 

संदेसा ,छुप गई 

मृगनयनी कोमल 

लताओं की ओट में 

अपलक निहारने लगी 

तुम्हारा ओजपूर्ण लावण्य

- वाह, बहुत सुन्दर वर्णन, ओजपूर्ण किन्तु कोमल भी, और एंटी-क्लाइमेक्स तो बहुत ही अच्छा है, सैयाद खुद शिकार हो गया.. बधाई हो राजेश जी! 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on August 16, 2012 at 3:17pm

कई दिन बाद आना हुआ यहाँ कुछ व्यस्त चल रही हूँ मेरी रचना आपको पसंद आई हार्दिक आभार प्राची जी बहुत पहले कि लिखी हुई है आज सोचा इसे ही पोस्ट कर देती हूँ 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on August 16, 2012 at 3:04pm
बहुत कोमल खूबसूरत शब्दों  के साथ कोमल भावों को संप्रेषित किया है, मन में सम्पूर्ण चित्र उभर गया, जैसे विडियो ही चल गया...
दो दिए प्रज्ज्वलित हो उठे वहां 

उस मृग  नयनी  आँखों में  

और तुम अपलक  देखते ही रह गए 

समझ नहीं पाए   तुम  

 कि  शिकार तुम्हारा 

दिल हो चुका  था 

पल में तुम्हारा दंभ

चकना चूर  हो गया  

क्षणभर में एक गर्वित शिकारी

कब भिक्षुक बन बैठा

पता ही ना चला.....      वाह वाह ..बहुत खूबसूरत बिम्बों से सजी इस रचना के लिए हार्दिक बधाई आदरणीया राजेश कुमारी जी

कृपया ध्यान दे...

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