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इस दौर में बेटों के मुक़ाबिल हैं बेटियाँ

अनजान हैं जो कह रहे, जाहिल हैं बेटियाँ
दुनिया में अब हर काम के,  काबिल हैं बेटियाँ

तौरो तरीके बा-अदब, रखना हैं जानती
इस दौर में बेटों के मुक़ाबिल हैं बेटियाँ

कुर्बान खुद को कर रही, उल्फत-ए-मुल्क पर
अब जंग के मैदाँ में भी शामिल हैं बेटियाँ

मौजे तमन्ना गर कोई, तूफाँ खड़ा करें   
जो थाम ले हर मौज वो साहिल हैं बेटियाँ

सबको यहाँ संवारतीं बन बेटी माँ बहन
इंसान की नेकी का ही हाशिल हैं बेटियाँ


संदीप पटेल "दीप"
सिहोरा , जबलपुर (म.प्र.)

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Comment

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Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on October 4, 2012 at 12:54pm

जी सर जी  मार्ग दिखाते रहिये सुझाते रहिये मंजिल हम पा कर दिखायेंगे आपको आशीर्वाद और स्नेह यूँ ही बनाये रखिये


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on October 4, 2012 at 12:22pm

किसी प्रविष्टि को पोस्ट करने में अपनायी गयी शीघ्रता जोकि कई जानी-समझी बातें दोषपूर्ण कर दे, उचित है ऐसा कोई नहीं मानेगा. आप भी मत मानिये.

सधन्यवाद

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on October 4, 2012 at 12:09pm

यहाँ शायद दौर को केवल दौ पढ़ गया जल्दबाजी के चलते

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on October 4, 2012 at 12:06pm

आदरणीय वीनस जी , सादर प्रणाम
आपका बहुत बहुत शुक्रिया आपने मुझे इक बार फिर वक़्त दिया इसके लिए मैं शुक्रगुजार हूँ आपका
\\ याद रखें कि मुजारे के मुजाहिफ अरकान में दूसरे रुक्न की दूसरी मात्रा दीर्घ नहीं हो सकती है, क्योकि मुजारे सालिम का दूसरा रुक्न २१२२ फाइलातुन है जिसमें दूसरी मात्रा मूल रूप से लघु है\\
ये नयी जानकारी मुझे मिली है इसकी कोई जानकारी नहीं थी पहले मुझे
मैं तो बस दोनों मिसरों को इक बार पढ़ के देख लिया फिर जो बहर बनी उसपे सारे अशआर कह दिए ऐसा करता हूँ
पद्धति के बारे में धीरे धीरे जितनी जानकारी होती जाएगी सीखता जाऊँगा
बस आप यूँ ही स्नेह बनाये रखिये अनुज पर

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on October 4, 2012 at 12:06pm

आदरणीय गुरुवर सौरभ सर जी सादर प्रणाम
आपका बहुत बहुत शुक्रिया सहित सादर आभार जो आपने इस ग़ज़ल को अपना बेशकीमती वक़्त दिया
फिर आपके कहे के अनुसार जो मैंने बहर ग़ज़ल के लिए राखी थी वो कहता हूँ

२ २ १ २ , २ २ १ २ , २ २ २ , २ १ २

उन्वान में जो बहर है उसमे  गड़बड़ है ......................वक़्त की मार से मेरी ग़ज़ल में बहुत बुरा प्रभाव पद रहा है सर जी अब से बिना तक्तीह के पोस्ट नहीं करूँगा वादा है आपसे

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on October 4, 2012 at 11:58am

आदरणीय गणेश बागी सर जी , आदरणीया राजेश कुमारी जी, आदरणीय भाई विन्ध्येश्वरी जी, आदरणीय भाई ब्रजेश जी सादर प्रणाम सहित
इस ग़ज़ल की पसंदगी के लिए तहे दिल से शुक्रिया और सादर आभार प्रेषित कर रहा हूँ
स्नेह अनुज पर बनाये रखिये

Comment by वीनस केसरी on October 4, 2012 at 2:24am

भाई संदीप पटेल जी प्रस्तुत बा-बहर मिसरों पर बधाई स्वीकार करें

अनजान हैं जो कह रहे, जाहिल हैं बेटियाँ

मौजे तमन्ना गर कोई, तूफाँ खड़ा करें   

सबको यहाँ संवारतीं बन बेटी माँ बहन

बाकी अशआर भी अच्छे हैं मगर उनको बहर की कसौटी पर एक बार घिस कर देख लें

(याद रखें कि मुजारे के मुजाहिफ अरकान में दूसरे रुक्न की दूसरी मात्रा दीर्घ नहीं हो सकती है, क्योकि मुजारे सालिम का दूसरा रुक्न २१२२ फाइलातुन है जिसमें दूसरी मात्रा मूल रूप से लघु है)


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on October 3, 2012 at 10:28pm

बेटियों की अस्मिता पर कहने का आपने बेहतर प्रयास किया है. बधाई संदीप भाई.

एक बात : कृपया साझा करें कि ग़ज़ल के उन्वान की आपने तक्तीह कैसे की है ?  सधन्यवाद .. .

Comment by Brajesh Kant Azad on October 3, 2012 at 9:06am

bahut khoob sandeep ji, badhayi

Comment by विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी on October 2, 2012 at 3:32pm
भाई संदीप जी बहुत खूब अशआर कहा आपने।हर शेर दिल को छू रहा है।दिली मुबारकबाद।

कृपया ध्यान दे...

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