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तीन मुक्तक ......//माँ

 

इस रक्त के संचार पे अधिकार तुम्हारा है 

श्वांसो के हरेक तार पे उपकार तुम्हारा  है
आँखों में चमकते हैं मुस्कान के जो मोती 
कुछ और नहीं माँ वो बस प्यार तुम्हारा है 
 
 
 
बिन बोले बिन उपदेश दिए ,कर्मो की गीता समझाई 
तुमने अपनी दिनचर्या से,पल-पल की कीमत बतलाई 
जब रुके कदम मन विकल हुआ श्रीहत साहस का स्वर्ण हुआ 
माथे पर उत्प्रेरित चुम्बन करती माँ मन में मुस्काई 


मेरी आँखों की पीर चुरा तुम हँसी वहाँ भर  जाती हो 
तुम परी हो मेरे सपनों की हर मुश्किल हल कर जाती हो
तुम माँ हो या जादूगरनी ,विस्मित हूँ ,दुर्गम दूरी से  
कैसे मेरे अनबोले ज़ख्मो पर मरहम धर जाती हो 

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Comment by seema agrawal on October 5, 2012 at 3:32pm

विनीता जी बहुत बहुत शुक्रिया ....सच कहूं तो मेरे लिए माँ बचपन में भी मेरी परी ,आज भी है और हमेशा रहेगी ...

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on October 5, 2012 at 2:09pm
माँ के उपकार का बदला नहीं चुकाया जा सकता 
उसकी मुस्कान और उसके प्यार अतुलनीय है 
उसका प्रारंभिक ज्ञान तो गुरु ज्ञान से बढ़कर है 
यह सब कुछ उस नारी शक्ति की महिमा है | अच्छी रचना के लिए हार्दिक बधाई आदरणीय सीमा अग्रवाल जी  
Comment by Arun Sri on October 5, 2012 at 1:22pm
तुम माँ हो या जादूगरनी ,विस्मित हूँ ,दुर्गम दूरी से  
कैसे मेरे अनबोले ज़ख्मो पर मरहम धर जाती हो ........... दिल को छू गई आपकी पंक्तियाँ ! निश्शब्द हूँ !
 

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on October 5, 2012 at 12:38pm
मेरी आँखों की पीर चुरा तुम हँसी वहाँ भर  जाती हो 
तुम परी हो मेरे सपनों की हर मुश्किल हल कर जाती हो
तुम माँ हो या जादूगरनी ,विस्मित हूँ ,दुर्गम दूरी से  
कैसे मेरे अनबोले ज़ख्मो पर मरहम धर जाती हो ---वाह दिल छू गई ये पंक्तियाँ तो बहुत ही प्यारी रचना 

 

Comment by Vinita Shukla on October 5, 2012 at 12:01pm
"तुम माँ हो या जादूगरनी ,विस्मित हूँ ,दुर्गम दूरी से  
कैसे मेरे अनबोले ज़ख्मो पर मरहम धर जाती हो"
सुन्दर और दिल को छूने वाली प्रस्तुति. बधाई.

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