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चन्द्रबदन!

तेरे कपोल पे तेरे नैनों का नीर

लागे जैसे सीप में मोती

शशी से भी तू सुन्दर लागे

जब ओढ़ चुनर तू है सोती

झरने सी तू चंचल है

सुन्दरता से भी सुन्दर है

सुगंध तेरी  जैसे कोई संदल

चन्द्रबदन, चन्द्रबदन, हय तेरा चन्द्रबदन…

 

तेरे केशों में वृक्षों सी शीतलता

अधर में मदिरा सी मादकता

कमर समुद्र सी हिचकोले खाए

घूंघट में तू छुईमुई सी लजाये

वाणी, वीणा से भी मधुर

संगमरमर सा तेरा हर अंग है

हल्के हैं तेरे रंग के आगे

धरती पे जितने भी रंग हैं

तेज है तुझमें ईश्वर सा

है तुझे मेरा ये नमन

चन्द्रबदन, चन्द्रबदन, हय तेरा चन्द्रबदन…

 

तू ही सांझ, तू ही मेरा भोर है

छवि तेरी हर दिशा में हर ओर है

गंगा से अधिक तू पवित्र है

तू ही कविता भी तू ही मेरा चित्र है

तू ही धन है मेरे लिए

तू ही मेरा उपहार है

तू अमूल्य है मेरे लिए

तेरे आगे सब बेकार है

खो ना जाए तू कहीं

आ कर लूं मैं तेरा जतन

चन्द्रबदन, चन्द्रबदन, हय तेरा चन्द्रबदन

 

आ मैं तेरा आलिंगन कर लूं

प्रेम से तुझको बाँहों में भर लूं

अधर से अधर को टकराऊँ

तुझमें ही मैं सिमटा जाऊं

प्रेम का रस भी तू

तू ही प्रेम का गीत है

तू ही सुगंध है प्रेम का

तू ही प्रेम संगीत है

अब नहीं है संयम मुझमें

आ कर ले तू मुझसे मिलन

चन्द्रबदन, चन्द्रबदन, हय तेरा चन्द्रबदन…

 

रणवीर प्रताप सिंह

 

 

 

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Comment by Ranveer Pratap Singh on December 18, 2012 at 9:46pm

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on December 16, 2012 at 8:40pm

श्रींगार रस और अलंकर का संगम, रचना को एक अलग उचाई पर ले जाता है, इस बेहतरीन रचना पर बहुत बहुत बधाई |

Comment by Ranveer Pratap Singh on November 21, 2012 at 9:17pm

@ manoj kumar chouhan shukriya

Comment by manoj kumar chouhan on November 20, 2012 at 2:24pm

BAHUT HI ACHHI ABHIVYAKTI

Comment by Ranveer Pratap Singh on November 17, 2012 at 7:27pm

@ Laxman Prasad Ladiwala आपने तो मेरी बड़ाई में ही एक ही एक कविता लिख दी... बहुत बहुत धन्यवाद इस प्रतिक्रिया के लिए.

Comment by Ranveer Pratap Singh on November 17, 2012 at 7:25pm

@ PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA बहुत धन्यवाद आपका, बस आपलोगों का आशीर्वाद इसी तरह से मिलता रहा तो और भी बेहतर  लिखता रहूँगा.

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on November 17, 2012 at 2:44pm

आ मैं तेरा आलिंगन कर लूं

प्रेम से तुझको बाँहों में भर लूं

अधर से अधर को टकराऊँ

तुझमें ही मैं सिमटा जाऊं

प्रेम का रस भी तू

तू ही प्रेम का गीत है

तू ही सुगंध है प्रेम का

तू ही प्रेम संगीत है

अब नहीं है संयम मुझमें

आ कर ले तू मुझसे मिलन

चन्द्रबदन, चन्द्रबदन, हय तेरा चन्द्रबदन…

आदरणीय रणवीर जी सादर 

मैं लिखना भी चाहूँ तो लिख नहीं सकता 

आपने बहुत बढ़िया लिख पढ़ कर मन प्रसन्न हुआ. 

बधाई. 

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on November 17, 2012 at 10:08am

रणवीर प्रताप सिंह सरीके आशिक 

विशेषण शब्दों कोष के है वे मालिक 
देखते सुन्दरता और नयनों में चंचलता  

आह भरते देख केशों में वृक्षों सी शीतलता

झूमते देख अधर में मदिरा सी मादकता ।

बधाई उनको जो ऐसा भान  हुआ 

ऐसा अहसास हुआ, ऐसा भाव मिला  

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