For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

रेत में जैसे निशां खो गए

रेत में जैसे निशां खो गए

हमसे तुम ऐसे जुदा हो गए

 

रात आँखें ताकती ही रहीं

मेहमां जाने कहाँ सो गए

 

सौंप दी थी रहनुमाई जिन्हें

छोड़कर मझधार में खो गए

 

बोझ लेकर आपके पाप का

कांधे  में अपने उसे ढो गए

 

मिलने का वादा किया था मगर

हिचकियाँ देकर वो गुम हो गए

 

कौन आया है सदा के लिए

हम गए जो आज कल वो गए

 

Views: 596

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by rajluxmi sharma on December 10, 2012 at 10:25pm

बहुत ही सुन्दर ग़ज़ल है...हार्दिक बधाई

Comment by नादिर ख़ान on December 7, 2012 at 11:27am

बहुत शुक्रिया अदरणीय प्राची जी 

बहुत  आभार ..


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on December 7, 2012 at 10:21am

आदरणीय नादिर खान जी,

बहुत सुन्दर ग़ज़ल कही है आपने.

मतला और पहला शेर ख़ास तौर पर बहुत पसंद आये....हार्दिक बधाई स्वीकार करे.

Comment by नादिर ख़ान on December 6, 2012 at 10:11pm

chandresh ji बहुत  शुक्रिया, आपने रचना को सराहा 

Comment by नादिर ख़ान on December 6, 2012 at 9:45pm

अदरणीय सौरभ जी सुझाओ के लिए बहुत शुक्रिया इसी तरह का मार्गदर्शन बनाये रखें ।


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on December 6, 2012 at 7:34pm

यहाँ पर सो इसलिये लिया है कि, जिन्हे रहनुमाई सौपी थी वो सो गए  हमें मझधार मे छोड़ कर... वैसे इस सो गए  और खो गए ने हमें भी 2 दिन परेशान किया था

नादिर भाई, आपकी बात भी अपनी जगह सही है. मैं भी इस पर यथोचित सोचा कि सो गये  रहने दूँ या खो गये समीचीन होगा.

पूरा शेर यों है -

सौंप दी थी रहनुमाई जिन्हें
छोड़कर मझधार में सो गए ..........   एकबारगी पढने पर लगता है कि जिन्हें रहनुमाई सौंपी गयी थी वे सौंपने वालों को छोड़ कर  खुद मझधार में  जाकर सो गये.  जबकि यह अर्थ बिल्कुल नहीं है. इसी दुविधा को खत्म करने के लिए मेरा खो गये सुझाव था, जिसके अनुसार अब जिन्हें रहनुमाई सौंपी गयी थी वे सौंपने वालों को मझधार में छोड़कर खो गये या वे खुद ही मझधार में कहीं खो गये, चाहे जो समझा जाय, अर्थ दोनों ढंग में अपने हिसाब से वाज़िब निकलेगा. वैसे भाईसाहब, शेर आपका है.  :-))

शुभेच्छाएँ

Comment by Dr. Chandresh Kumar Chhatlani on December 6, 2012 at 6:52pm

बहुत खूब नादिर खान जी | बहुत ही सुन्दर ग़ज़ल है |

 

सौंप दी थी रहनुमाई जिन्हें

छोड़कर मझदार में सो गए

 

बोझ लेकर आपके पाप का

कांधे  में अपने उसे ढो गए

क्या बात है जनाब ||

Comment by नादिर ख़ान on December 6, 2012 at 4:18pm

महिमा जी  आपका बहुत शुक्रिया आपने रचना को पसंद किया ।

Comment by नादिर ख़ान on December 6, 2012 at 4:17pm

अदरणीय सौरभ जी बहुत शुक्रिया आपने कोशिश को सराहा और आपके मार्गदर्शन के लिए बहुत आभार

हमने मझधार की त्रुटि सुधार ली है ।

 सौंप दी थी रहनुमाई जिन्हें
छोड़कर मझदार में सो गए  

यहाँ पर सो इसलिये लिया है कि, जिन्हे रहनुमाई सौपी थी वो सो गए 

हमें मझधार मे छोड़ कर... वैसे इस सो गए  और खो गए ने हमें भी 2 दिन परेशान किया था ।

कृपया मार्गदर्शन दें 

Comment by MAHIMA SHREE on December 6, 2012 at 3:39pm

कौन आया है सदा के लिए

हम गए जो आज कल वो गए....

बहुत खूब ... आदरणीय बधाई स्वीकार करें

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity


सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to जगदानन्द झा 'मनु''s discussion गजल in the group मैथिली साहित्य
"आदरणीय जगदानन्द झा मनु जी, अहाँ बड्ड नीक गजल पठेलियै. सबसे पहिल, त हम प्रयुक्त भेल बहरक विषय में…"
Aug 18
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post हरिगीतिका छंद
"आदरणीय सौरभ जी सादर प्रणाम, प्रस्तुत हरिगीतिका छंद पर आपकी प्रतिक्रिया से सृजन सफल हुआ है. आपके…"
Aug 15
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post हरिगीतिका छंद
"आदरणीय श्याम नारायण वर्मा जी सादर, प्रस्तुत छंदों पर उत्साहवर्धन के लिए आपका हार्दिक आभार.…"
Aug 15
जगदानन्द झा 'मनु' added 2 discussions to the group मैथिली साहित्य
Aug 10
Shyam Narain Verma commented on Ashok Kumar Raktale's blog post हरिगीतिका छंद
"नमस्ते जी, बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति, हार्दिक बधाई l सादर"
Aug 6

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Ashok Kumar Raktale's blog post हरिगीतिका छंद
"  आदरणीय अशोक भाईजी, श्रावण मास का आज प्रथम सोमवार है. ऐसे पवित्र दिवस पर आप द्वारा प्रस्तुत…"
Aug 3

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on रोहित डोबरियाल "मल्हार"'s blog post दास्तां
"आदरणीय रोहित डोबरियाल "मल्हार" जी, आपकी भावुक प्रस्तुतीकरण का स्वागत है.  आप…"
Aug 3

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on vijay nikore's blog post सांकल मन के द्वार पर
"  निर्निमेष आँखों की प्रतीक्षा उत्कट तीव्रता के साथ शाब्दिक हुई है, आदरणीय विजय निकोर…"
Aug 3

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to आशीष यादव's discussion कइके हमके ब्लाॅक पिया ना ……..  (कजरी) in the group भोजपुरी साहित्य
"वाह वाह वाह .. सावन की कजरी का आधुनिक रूप गुदगुदा गया, आदरणीय आशीष जी.  सही भी है, प्रकृति के…"
Aug 3
आशीष यादव replied to आशीष यादव's discussion कइके हमके ब्लाॅक पिया ना ……..  (कजरी) in the group भोजपुरी साहित्य
"आदरणीय श्री अशोक कुमार जी इस कजरी पर टिप्पणी के लिए आपको बहुत बहुत धन्यवाद।  आज के परिवेश…"
Jul 27
Ashok Kumar Raktale replied to आशीष यादव's discussion कइके हमके ब्लाॅक पिया ना ……..  (कजरी) in the group भोजपुरी साहित्य
"आदरणीय आशीष यादव जी सादर, सावन की सुंदर और मधुर  फुहारों में यह कजरी की प्रस्तुति  बहुत…"
Jul 27
vijay nikore posted a blog post

सांकल मन के द्वार पर

सांकल मन के द्वार परजब-जब जहाँ कहीं फूल खिलेयाद तुझे किया था हमने ...कहती थी न ..."क्या...तुम्हारे…See More
Jul 27

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service