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दूरियों की दूरी

दूरियों की दूरी
मंज़िल की ओर बढ़ने से सदैव
दूरियों की दूरी ...
कम नहीं होती।

बात जब कमज़ोर कुम्हलाय रिश्तों की हो तो
किसी "एक" के पास आने से,
नम्रता से, मित्रता का हाथ बढ़ाने से,
या फिर भीतर ही भीतर चुप-चाप
अश्रुओं से दामन भिगो लेने से

रिश्ते भीग नहीं जाते,
उनमें पड़ी चुन्नटें भी ऐसे
कभी कम नहीं होतीं।
रिश्तों में रस न रहा जब शेष हो
तो पतझड़ के पेड़ों की सूखी टहनियों की तरह
टूट-टूट जाते हैं वह

ज़मीन पर गिरे सूखे पत्तों की तरह
वह पैरों के तले कुचले भी जाते हैं,
और इस पर भी हम मुँह में उँगली दबाए
वास्तविकता से अनभिज्ञ, बैठे सोचते हैं ...
हमने तो मित्रता का हाथ बढ़ाया था,
टहनी-से टूटते अबोध विश्वास को

संबल ही दिया था ... फिर यह क्या हुआ?
संभ्रमित हैं, भूलते हैं हम कि ऐसे में
दिलों की दूरियों को मिटाने के लिए,
विश्वास के पुन: पनपने के लिए,
"दोनों" के ख़्यालों की झंकार को,

"दोनों" के अनुबंध की अनुगूँज को,
एक ही "फ़्रिकुएन्सी" पर होना अनिवार्य है,
केवल एक को नहीं, पास दोनों को आना है।
दामन में कुछ पुराने कुछ और नए दर्द छिपाए
किंकर्तव्यविमूढ़

प्रत्याशा से ठगे-ठगे, हम बैठे सोचते हैं ...
यह संसार इतना निष्ठुर क्यूँ है?
तनिक भी झूठ-दिखावे को दूर रखे,
केवल सच्चाईयों से, इमानदारी से
इन दूरियों की दूरी कम क्यूँ नहीं होती? ... ??

----------
-- विजय निकोर
vijay2@comcast.net

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प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on January 15, 2014 at 12:58pm

//अश्रुओं से दामन भिगो लेने से
रिश्ते भीग नहीं जाते,
उनमें पड़ी चुन्नटें भी ऐसे
कभी कम नहीं होतीं।//

बहुत की कोमल भावों को बहुत ही सुन्दर शब्द दिए हैं आ० विजय निकोर जी. पढ़ कर आनंद आया, मेरी हार्दिक बधाई स्वीकारें।

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on December 13, 2012 at 5:04pm

मन अनंत है
विशाल हृदय सागर
कितनी मौजें उठती और
मचल के शांत हो जाती हैं
कहीं कहीं कुछ टीले दीखते हैं
पर आराम किसे करना है
दूरियों को मापना नहीं
तय करना है
और ऐसे मैं ये कम कैसे हो जाएगी

बहुत सुन्दर रचना साहब बहुत बहुत बधाई आपको

Comment by Shyam Narain Verma on December 13, 2012 at 3:12pm

BAHOT KHOOB

Comment by Dr.Ajay Khare on December 13, 2012 at 1:36pm

risto ki najakat bade hi badia tarike se ki he badhai

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