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जहाँ पूजित है नारी वहां फिर क्यों शर्मसार हुई है,
स्वच्छंद विचरण का क्या उसको अधिकार नहीं है ।
जहाँ वोटों के राजनीति, गुण्डों की तूती बजती है,
पंगु है क़ानून व्यवस्था, जो हमको बेहद खलती है  ।
   
शर्म से झुक गयी आँखे मानवता का ढोंग पीटते,
मजबूर हुई क्यों नारी,जिन्दा रहने का प्रश्न करते ।
लीक पीटते संसद में भी, इस पर जो शोर मचाते,
फांसी दो व्यभिचारो को,अब और विलम्ब न चाहते।
 
-लक्ष्मण प्रसाद लड़ीवाला 

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Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on December 25, 2012 at 8:08pm

रचना पसंद कर होसला अफजाई हेतु हार्दिक आभार भाई श्री अशोक रक्तले जी 

Comment by Ashok Kumar Raktale on December 25, 2012 at 7:37pm

सभी मन आंदोलित है सभी आक्रोशित है सब चाहते हैं ये सूरत बदले. बहुत सुन्दर रचना सादर बधाई स्वीकारें आदरणीय लड़ीवाला साहब जी.

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on December 21, 2012 at 8:05pm
हार्दिक आभार आदरणीया सीमा अग्रवाल जी- 

वियोगी होगा पहला कवि, आह से निकली होगी तान 

निकल कर आँखों से चुपचाप,होगी कविता प्रथम अनजान 
Comment by seema agrawal on December 21, 2012 at 7:19pm

अंतर्मन को झिंझोड़ती घटना के आक्रोश से उपजी  आपकी इस रचना के लिए हार्दिक बधाई लक्ष्मण जी 

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on December 21, 2012 at 11:43am

रचना में निहित बात का समर्थन करने के लिए आभार श्री अरुण शर्मा अनंत जी

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on December 21, 2012 at 11:28am
खेल नहीं या विधना का नारी, यह खलनायक की चाल है,
गुरुकुल सा सिक्षण हो सबको, अब इसकी ही दरकार है ।
कर्तव्य समझा और निभाया, सबको इसका गर भान  है,
जीवन को समझ इंसा बने, बस अब इसकी ही दरकार है ।
Comment by अरुन 'अनन्त' on December 21, 2012 at 11:26am

आदरणीय सर अखंड सत्य बयां किया है आपने, जब तक कोई कठोर कानून पारित नहीं होगा ये सिलसिला यूँ ही चलता रहेगा, परन्तु अब बस बहुत होगा इस तरह का यह अपमान और कब तक.

Comment by SUMAN MISHRA on December 21, 2012 at 12:57am

खलने से क्या होगा, ये जीवन चलता ऐसे ही,

ये विधना का ही खेल है जो नारी ने इतना भार सहा

ना शक्ति माप, कर्तव्य आंक,बस नारी नारी येही कहो
हमने जीवन को समझा कब जब इंसा इंसा बन ना सका

(यछ प्रश्न है आपकी कविता प्रसाद सर,,,)

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