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मुक्तिका: संजीव 'सलिल'

मुक्तिका:

संजीव 'सलिल'

*

मगरमच्छ आँसू बहाने लगे हैं।
शिकंजे में मछली फँसाने लगे हैं।।
 
कोयल हुईं मौन अमराइयों में।
कौए गजल गुनगुनाने लगे हैं।।
 
न ताने, न बाने, न चरखा-कबीरा 
तिलक- साखियाँ ही भुनाने लगे हैं।।
 

जहाँ से निकलना सम्हल के निकलना,
अपनों से अपने ठगाने लगे हैं।।

'सलिल' पत्थरों पर निशां बन गए जो
बनने में उनको ज़माने लगे हैं।। 

***

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Comment

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Comment by अमि तेष on December 26, 2012 at 11:35pm

वाह ...शानदार 

Comment by sanjiv verma 'salil' on December 26, 2012 at 8:06pm

arun ji, pradeep ji, mahima ji, ashok ji

apka abhar shat-shat.

Comment by Ashok Kumar Raktale on December 26, 2012 at 6:23pm

परम आदरणीय सलिल जी सादर, बहुत सुन्दर मुक्तिका बधाई स्वीकारें.

Comment by MAHIMA SHREE on December 26, 2012 at 5:38pm

न ताने, न बाने, न चरखा-कबीरा
तिलक- साखियाँ ही भुनाने लगे हैं।।

सलिल' पत्थरों पर निशां बन गए जो
बनने में उनको ज़माने लगे हैं।।

आदरणीय सर ..वाह !!
क्या खूब कही आपने ..बधाई स्वीकार करें

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on December 26, 2012 at 4:31pm

सर जी निश्चय ही बनाने में ज़माने लगे हैं 

सादर अभिवादन के साथ बधाई,

Comment by अरुन 'अनन्त' on December 26, 2012 at 2:00pm

वाह आदरणीय सलिल सर वाह बेहद सुन्दर मुक्तिका: रची है, मुझे बेहद पसंद आई और रचना कई बार पढ़ी बधाई स्वीकारें.

Comment by sanjiv verma 'salil' on December 26, 2012 at 10:18am

apka abhar shat-shat.


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on December 25, 2012 at 9:22pm

'सलिल' पत्थरों पर निशां बन गए जो

बनने में उनको ज़माने लगे हैं।। 

 वाह वाह आदरणीय सलिल जी क्या बात कही ,दाद कबूल कीजिये 

Comment by Shyam Narain Verma on December 25, 2012 at 1:16pm

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