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ग़ज़ल-जिंदगी हम भी समर तक आ गये

जिंदगी हम भी समर तक आ गये।
गाँव से चलकर नगर तक आ गये।।

मुस्कुराते - मुस्कुराते वो सभी …,
रास्ते के पेड घर तक आ गये।

सामने आते ही उनके यूँ हुआ,
ज़ख़्म सब दिल के नज़र तक आ गये।

खूबसूरत सी बला लगती है वो,
बाल जब सर के कमर तक आ गये।

एक जंगल में पुराना पेड हूँ,
काटने को वो इधर तक आ गये।

प्यार एहसासों से निकला इस तरह,
दिल के रिश्ते अब खबर तक आ गये।।

……सूबे सिंह सुजान

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Comment by सूबे सिंह सुजान on January 8, 2013 at 9:17pm

अशोक कुमार जी .,,,,,,,,,आपकी प्रतिक्रिया का तहे दिल से स्वागत है।।।।।।।।।।

Comment by Ashok Kumar Raktale on January 8, 2013 at 7:55pm

आदरणीय सूबे सिंह जी सादर, बहुत ही सुन्दर गजल हर शेर लाजवाब. वाह!

Comment by सूबे सिंह सुजान on January 6, 2013 at 9:06pm

अरून शर्मा अन्नत............जी आपने पसंद किया।। आपका आभार।।

मैं भी लिखने का प्रयास भ करता ही हता हूं जैसा न जाये वो पेश रहता है।।

Comment by अरुन 'अनन्त' on January 6, 2013 at 1:45pm

मित्रवर बहुत ही सुन्दर ग़ज़ल कही है, खासकर ये दो अशआर ज्यादा पसंद आये, हार्दिक बधाई

सामने आते ही उनके यूँ हुआ,
ज़ख़्म सब दिल के नज़र तक आ गये

प्यार एहसासों से निकला इस तरह,
दिल के रिश्ते अब खबर तक आ गये

Comment by सूबे सिंह सुजान on January 5, 2013 at 10:29pm
Dr. Prachi Singh .......ji aapki partikriya ka sawaghat hai...........thanks

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on January 5, 2013 at 3:04pm

आ. सूबे सिंह सुजान जी, इस सुन्दर ग़ज़ल को पेश करने के लिए हार्दिक बधाई 

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