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डा . तुकबंद की तबाहियां

डा . तुकबंद की तबाहियां

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निकला मेरा जनाजा उनके इश्क की छाँव में

फूल बिछाए हमने बिखेरे कांटे उन्होंने राह में

भूल गए वो कि जनाजा तो काँधे पे जाएगा

गुजरेंगी इस राह से कोई बहुत याद आएगा

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आशिक और शायरों की है अलग पहचान

जानते हैं सब फिर भी बनते हैं अनजान

आशिकी में आशिक बस करते हैं आह आह

पढ़े गजल शायर लोग करते हैं वाह वाह

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रेशमा और शेरा बैठे थे नदी किनारे

तभी आ गए दोनों के ससुर बिचारे

देख कर उन्हें दोनों सकपका गए

जान हश्र दिन में तारे नजर आ गए

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अनारकली को जंजीरों का गम न था

सलीम को नीचे तहखानो का इल्म न था

बाप था उसका बहुत ही होशियार  

सलीम जैसा शेर हाय हो गया शिकार 

------------------------------------

भेज दो शेर अपने ख्वाबों के मंजर से

चुन चुन के तेरे नाम इक गजल लिख दूं

दिल जिगर और जान तेरे नाम कर चुके

तमन्ना है चुन सितारे एक अदब लिख दूं

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प्रदीप कुमार सिंह कुशवाहा ११-१-२०१३

Views: 529

Comment

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Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on February 17, 2013 at 5:11pm

आदरणीय अशोक जी 

सादर 

आभार प्रोत्साहन हेतु 

Comment by Ashok Kumar Raktale on January 25, 2013 at 8:03pm

आदरणीय प्रदीपजी सादर, सुन्दर तुकबन्दियाँ. मजा आगया. बधाई.


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on January 13, 2013 at 8:35pm

आभार, आदरणीय प्रदीपजी.

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on January 13, 2013 at 7:19pm

आदरणीय गुरुदेव सौरभ जी 

सादर अभिवादन 

सर जी आशिकी एक दिन जरूर रंग लाएगी 

कबीरा से डा . तुकबंद तक पी.एच .डी . कराएगी 

आपको सुख मिला . आभार 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on January 13, 2013 at 4:55pm

इस झोला छाप तुक्काड़ को मेरा नमन.. . हम जैसे रोगियों के लिए जीवन-रसना इसी पानी की धार से आती है.  अरे भाई, अपन भी आशिक भये.  जय होऽऽऽ

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on January 13, 2013 at 4:33pm

आदरणीय बाग़ी जी, सादर 

झोला छाप डाक्टरों से भी भारत में मरीज ठीक होते हैं.सभी मरते नही.

आपके हस्ताक्षर हुए, आभार 

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on January 13, 2013 at 4:30pm

आदरणीय अनन्त जी 

सादर 

धन्यवाद 


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on January 12, 2013 at 8:51pm

//आशिक और शायरों की है अलग पहचान
जानते हैं सब फिर भी बनते हैं अनजान
आशिकी में आशिक बस करते हैं आह आह
पढ़े गजल शायर लोग करते हैं वाह वाह//

क्या बात है आदरणीय प्रदीप कुशवाहा जी, तुकबंदी में भी कमाल की बात कही है, बधाई स्वीकार करें |

Comment by अरुन 'अनन्त' on January 12, 2013 at 11:20am

आदरणीय कुशवाहा सर दर्द और हंसी का सुन्दर चित्रण, मजेदार रचना है सर हार्दिक बधाई.

कृपया ध्यान दे...

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