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ग़ज़ल : बुना कैसे जाये फ़साना न आया

(बह्र: मुतकारिब मुसम्मन सालिम)

(वज्न: १२२, १२२, १२२, १२२

बुना कैसे जाये फ़साना न आया,
दिलों का ये रिश्ता निभाना न आया,

लुटाते रहे दौलतें दूसरों पर,
पिता माँ का खर्चा उठाना न आया,

चला कारवां चार कंधों पे सजकर,
हुनर था बहुत पर जिलाना न आया,

दिलासा सभी को सभी बाँटते हैं,
खुदी को कभी पर दिलाना न आया,

जहर से भरा तीर नैनों से मारा,
जरा सा भी खुद को बचाना न आया,

किताबें न कुछ बांचने से मिलेगा,
बिना ज्ञान दर्पण दिखाना न आया,

बुढ़ापे ने दी जबसे दस्तक उमर पे,
रुके ये कदम फिर चलाना न आया,

मुहब्बत का मैंने दिया बेसुधी में,
बुझा तो दिया पर जलाना न आया,

समंदर के भीतर कभी कश्तियों को,
बिना डुबकियों के नहाना न आया.

("मौलिक व अप्रकाशित")

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Comment by बृजेश नीरज on March 1, 2013 at 11:45pm

अरून जी आपके प्रयास पर आपको बधाई!

Comment by upasna siag on February 4, 2013 at 3:15pm

किताबें न कुछ बांचने से मिलेगा,
बिना ज्ञान दर्पण दिखाना न आया,.........बहुत सुन्दर 

Comment by Aarti Sharma on February 3, 2013 at 7:44pm

वाह अरुण जी.बहुत सुन्दर प्रस्तुति ..बधाई स्वीकारें...

Comment by अरुन 'अनन्त' on February 3, 2013 at 5:38pm

वाह आदरणीय गुरुदेव श्री अरुण सर वाह आपने तो मेरा दिन बना दिया. मेरी रचना को प्राण प्रदान कर दिया आपने. तहे दिल से आभार.

Comment by अरुन 'अनन्त' on February 3, 2013 at 5:38pm

आदरणीय गुरुदेव श्री सौरभ सर हार्दिक आभार.

Comment by अरुन 'अनन्त' on February 3, 2013 at 5:36pm

आदरेया महिमा श्री जी धन्यवाद

Comment by अरुन 'अनन्त' on February 3, 2013 at 5:36pm

बंधुवर संदीप जी सराहना हेतु आभार

Comment by अरुन 'अनन्त' on February 3, 2013 at 5:35pm

पाठक जी शुक्रिया


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by अरुण कुमार निगम on February 3, 2013 at 12:44pm

गज़ल खूबसूरत अरुण ने लिखी है

इसे प्यार से गुनगुनाना करेंगे..........

भटके हुए से हुआ सामना तो

अरुण की गज़ल को सुनाया करेंगे.....

हर शेर लाजवाब, बधाई........................................


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on February 3, 2013 at 6:00am

अरुन अनन्तजी, बह्र साधने का बढिया प्रयास हुआ है. प्रयासरत रहें. यही प्रयास आगे कथन को साधने के क्रम में काम आयेगा.

आदरणीय अशोकजी तथा भाई संदीप के कहे से मैं भी सहमत हूँ. अश’आर की संख्या कम रखने से भर्ती के शेरों से निजात मिल सकती है. लेकिन साथ ही मुझे यह भी मालूम है कि शुरुआती दौर में रचना-प्रयास और-और की मांग करता है. बच्चनजी की वो प्रसिद्ध पंक्ति है न .. ’और-और की रटन लगाता जाता हर पीनेवाला.. ’ !

शुभेच्छाएँ

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