For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

आईने में एक प्रतिबिम्ब
खड़ा है मौन !
आँखों के पीछे से
आवाज आई - कौन ?

है कौन यह अपरिचित?
क्या है यह अपना मीत ?
यह कैसी है संवेदना?
यह किसकी है सदा ?
क्या कहीं ढह गई..
जन्मांतर की भीत ?

किससे मिलने को
मैं हूँ आमादा ?
क्यों है हृदय मेरा
इतना द्रवित ?

सदियों से जीवित यह आत्मा, कभी-कभी इस शरीर की सांसारिक पूर्णता से विमुख होकर कुछ ढूँढती है ! क्या उसे कोई पुरानी कड़ी याद आती है ?

Views: 716

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by Anwesha Anjushree on February 6, 2013 at 6:31pm

Sourabh ji..I understood that very well after reading ur comment..anyways Thanx


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on February 5, 2013 at 10:49pm

शायद मैं ऐसे विषय नहीं समझ पाता. आदरणीया अन्वेषाजी, आपने सही कहा है. 

सादर

Comment by Anwesha Anjushree on February 5, 2013 at 6:49pm

सौरभ जी मेरे लेख को ध्यान से पढने के लिए शुक्रिया ! आत्मा कालखंड में आबद्ध  नहीं है, यह अमर है, पर  यह वस्त्र बदलती है, नए वेश भूषा में कुछ पल ठहरती है ! मेरे लिखने का अर्थ यही था !


इस समाज में सोच के कुछ दायरे है , मनुष्य किस बात में सुख पायेगा, किस बात में दुखी होगा , इस पर भी समाज कुछ सोच रखता है ! भौतिक और मानसिक रूप से सुखी या दुखी होने के बारे में भी यह समाज  एक सोच रखता है ! मैंने उसी को सांसारिक पूर्णता कहा है ! मेरी  आत्मा इस समाज के नियमो सा चले, यह जरुरी तो नहीं, जिस बात से समाज में लोग खुश हो, मेरी आत्मा भी उससे खुश हो, यह जरुरी तो नहीं !
मनोदशा की बात अगर कहे तो मैं यह कहूँगी की साधारण चिंता धारा से मेरी सोच अलग है ! 
नमन 

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on February 5, 2013 at 7:11am

अन्वेषा जी, अनवरतता को स्वर देती आपकी यह विचारपरक कविता बहुत कुछ कहती हुई लगी. कहे से अधिक अनकहे को इंगित करती. अपनी अनुभूतियाँ ही हमारी आदतें होती हैं, जोकि लभ्य-अप्राप्य के प्रति तोष या फिर चाह का कारण हैं. यही आदतें निरंतरता को जीती हुई क्रमशः परिपाटियाँ और फिर संस्कार बनती हैं. आपकी कविता सही कह रही है कि यह सारा कुछ किसी एक जन्म से बँधा नहीं है, बल्कि यह सारा कुछ जीव के भौतिक प्रादुर्भावों की एक शृंखला की कड़ियों से प्राण पाता, संतुष्ट हुआ करता है.

भाव-दशा बहुत सुन्दर ढंग से बहे हैं. इस कविता के लिए बहुत-बहुत बधाई.

एक बात :

//सदियों से जीवित यह आत्मा, कभी-कभी इस शरीर की सांसारिक पूर्णता से विमुख होकर कुछ ढूँढती है ! क्या उसे कोई पुरानी कड़ी याद आती है ?//

यहाँ आत्मा शब्द समीचीन नहीं है. आत्मा अनवरत है. वह कालखण्ड में आबद्ध नहीं. दूसरे, सांसारिकता है ही अपूर्णता का पर्याय. फिर सामासिक शब्द ’सांसारिक-पूर्णता’ क्या इशारे करता है. सांसारिक और भौतिक प्राप्तियों के प्रति ’प्रत्याहार’ के भाव संतुलित मन, संयत वृत्ति तथा उन्नत संतोष का परिचायक हैं, अन्वेषाजी.

आप जो कुछ कहना चाहती हैं वह संभवतः मैं समझ रहा हूँ किन्तु इस तरह की मनोदशा से संबंधित शब्दों का अपना अलग संसार हुआ करता है, मैं उसी ओर इंगित कर रहा हूँ.

सादर

Comment by Anwesha Anjushree on February 4, 2013 at 10:25pm

Shri Laxman Prasad ji , Ajay ji, Arun ji, vijay ji, Ram Shiromani ji aur Vijay ji....meri rachna ko padhne ke liye aur pasand karne ke liye shukriya...naman aap sabhi ko

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on February 4, 2013 at 4:21pm

आत्मा तो अमर है, यह तो सांसारिक भौतिक जीवन में चौला बदलती हुई अमर ही रहती है  इसको पहचानना

और ईश्वर की अमुल्य दें मानते हुए इसमें स्फुरित शब्दों का अहसास करना, आद्यात्म की ओर कदम बढ़ाना है।

आपकी बहुत सुन्दर अभ्व्यक्ति की लिए हार्दिक बधाई अन्वेषा अन्जुश्री जी  

Comment by Dr.Ajay Khare on February 4, 2013 at 2:44pm

bah bah bah anvesha madam dil ko chuti hui rachana he bhdhai aap ki lekhan ki jitni bhi pareef ki jaye kam he

Comment by अरुन 'अनन्त' on February 4, 2013 at 11:35am

आदरेया बेहद सुन्दर अभिव्यक्ति बधाई स्वीकारें.

Comment by विजय मिश्र on February 4, 2013 at 11:28am

सुन्दर रचना ,साधुबाद 

अन्वेषाजी के पास भी हैं कुछ प्रश्न अनुत्तरित और कुछ पहचान हैं गौण ,तभी तो उपस्थित होता है यह --- कौन ?

Comment by ram shiromani pathak on February 4, 2013 at 11:20am

है कौन यह अपरिचित?
क्या है यह अपना मीत ? 
यह कैसी है संवेदना?
यह किसकी है सदा ?
क्या कही ढह गई..
जन्मांतर की भीत ?

सुन्दर  अभिव्यक्ति।

आदरणीया अन्वेषा जी:  बधाई आपको,

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Blogs

Latest Activity

Sushil Sarna posted a blog post

दोहा एकादश. . . . . पतंग

मकर संक्रांति के अवसर परदोहा एकादश   . . . . पतंगआवारा मदमस्त सी, नभ में उड़े पतंग । बीच पतंगों के…See More
1 hour ago
Admin posted discussions
15 hours ago
Admin added a discussion to the group चित्र से काव्य तक
Thumbnail

'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 175

 आदरणीय काव्य-रसिको !सादर अभिवादन !!  ’चित्र से काव्य तक’ छन्दोत्सव का यह एक सौ…See More
16 hours ago

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey posted a blog post

नवगीत - भैंस उसी की जिसकी लाठी // सौरभ

   जिस-जिस की सामर्थ्य रही है धौंस उसी की एक सदा से  एक कहावत रही चलन में भैंस उसीकी जिसकी लाठी…See More
16 hours ago

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post देवता क्यों दोस्त होंगे फिर भला- लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"
"आपने कहे को सस्वर किया इस हेतु धन्यवाद, आदरणीय  //*फिर को क्यों करने से "क्यों "…"
17 hours ago

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Saurabh Pandey's blog post नवगीत : सूर्य के दस्तक लगाना // सौरभ
"रचना को आपने अनुमोदित कर मेरा उत्साहवर्धन किया, आदरणीय विजत निकोर जी हार्दिक आभार .. "
17 hours ago
Sushil Sarna commented on vijay nikore's blog post सुखद एकान्त है या है अकेलापन
"आदरणीय जी सादर प्रणाम -  अद्भुत सृजन - हृदय तटों को छूती गहन भावों की अभिव्यक्ति ने अहसासों की…"
yesterday
vijay nikore commented on vijay nikore's blog post सुखद एकान्त है या है अकेलापन
"प्रिय अशोक कुमार जी,रचना को मान देने के लिए हार्दिक आभार। -- विजय"
Monday
vijay nikore commented on vijay nikore's blog post सुखद एकान्त है या है अकेलापन
"नमस्ते, सौरभ जी। आपने सही कहा.. मेरा यहाँ आना कठिन हो गया था।       …"
Monday
vijay nikore commented on Saurabh Pandey's blog post नवगीत : सूर्य के दस्तक लगाना // सौरभ
"प्रिय सौरभ भाई, नमस्ते।आपका यह नवगीत अनोल्हा है। कई बार पढ़ा, निहित भावना को मन में गहरे उतारा।…"
Monday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post देवता क्यों दोस्त होंगे फिर भला- लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"
"आ. भाई सौरभ जी सादर अभिवादन। गजल पर उपस्थिति और विस्तृत टिप्पणी से मार्गदर्शन के लिए हार्दिक आभार।…"
Saturday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post सच काफिले में झूठ सा जाता नहीं कभी - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'
"आ. भाई सुशील जी, सादर अभिवादन। गजल पर उपस्थिति और उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक धन्यवाद।"
Saturday

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service