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जागतीआँखें .. टूटते ख्वाब...

पत्थरों के शहर मे दिल ही टूटते थे अभी,
भरम भी टूट गया अब के, अच्छा ही हुआ..
दोस्ती लफ्ज़ से नफ़रत थी हमको पहले भी,
रहा सहा यकीं भी उठ गया अच्छा ही हुआ..
खुली थी आँखें फिर भी नींद आ गयी जाने,
तुमने झकझोर के जगा दिया अच्छा ही हुआ..
ज़मीन होती क़दम तले तो भला गिरते क्यों,
हवा मे उड़ने का अंजाम मिला अच्छा ही हुआ..
ख्वाब था या के हादसा था जो गुज़र ही गया,
यकीं से अपने यकीं उठ गया अच्छा ही हुआ..
यूँ भी मुर्दे पे सौ मन मिट्टी थी पहले से,
एक मन और पड़ गयी तो क्या , अच्छा ही हुआ..
किसी को मीत अब कहना तो क़दर भी करना,
हमारे साथ खैर जो किया अच्छा ही हुआ..
दराज़ उम्र भला होती क्या दुआओं से,
दुआ की भीख न दी तुमने अच्छा ही हुआ......

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Comment

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Comment by Sonam Saini on March 4, 2013 at 2:43pm

आदरणीय मैम नमस्कार.......

दोस्ती लफ्ज़ से नफ़रत थी हमको पहले भी,

रहा सहा यकीं भी उठ गया अच्छा ही हुआ.....

sahi kaha ..........................

अफसुर्दा होना मेरा तेरा ही अत्फ़ था

तेरे ही तसव्वुर से आब-ए-चश्म यार निकले ......


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on February 16, 2013 at 7:27pm

दर्दे ग़मों की जमीन पर रची गई यह रचना बरबस आकर्षित करती है , आदरणीया सरिता सिन्हा जी , आपकी और रचना तथा साथी सदस्यों की रचनाओं पर आपके बहुमूल्य विचार आमंत्रित हैं ।

इस अभिव्यक्ति पर बधाई स्वीकार करें ।

Comment by Sarita Sinha on February 15, 2013 at 11:24pm

मंजरी दी, अपने समय दिया , बहुत बहुत धन्यवाद,...

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on February 15, 2013 at 5:32pm

जो हुआ अच्छा हुआ 

जो होगा वो भी अच्छा होगा 

सुन्दर गजल 

बधाई, ईश पुत्री 

सस्नेह 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on February 15, 2013 at 4:59pm

पारस्परिक संबंधों और वैचारिक तारतम्यता की टूटन पर आपकी कलम क्य्ता खूब चली है ! दर्द मानो बहते लावा की तरह लगातार पसरता गया है.

ज़मीन होती क़दम तले तो भला गिरते क्यों,
हवा मे उड़ने का अंजाम मिला अच्छा ही हुआ..

इस द्विपदी ने वो कुछ साया किया है जिसका आकाश बहुत विस्तृत है.

भावाभिव्यक्ति के लिए हार्दिक बधाई.. .

Comment by mrs manjari pandey on February 15, 2013 at 10:14am

जागती आँखों से अच्छी रचना कर दी अच्छा  ही हुआ

Comment by Sarita Sinha on February 14, 2013 at 11:07pm

उपासना जी, नमस्कार,
मनोभावों को समझने के लिए आपका धन्यवाद..

Comment by Sarita Sinha on February 14, 2013 at 11:06pm

वेदिका जी नमस्कार,
समय देने के लिए धन्यवाद..

Comment by Sarita Sinha on February 14, 2013 at 11:04pm

संदीप जी नमस्कार,
एहसास को समझने के लिए धन्यवाद..

Comment by Sarita Sinha on February 14, 2013 at 10:55pm

प्रिय प्रवीण जी नमस्कार, सच बताऊं मुझे ज़रा भी अंदेशा होता कि आप यहाँ आ सकती हैं तो मैं इस नामुराद रचना को यहाँ  पोस्ट ना करती....हा हा हा हा ... 

कृपया ध्यान दे...

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