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तुमसे मिलने का असर है मुझ पर --- मीना पाठक

कभी चाह थी बहुत दिल मे 
कि छू लूँ मैं भी बढ़ा के हाथ 
मिट्टी,हवा,पानी इन सब को 
पीछे छोड़ शून्य को 
जिंदगी को चाह थी भरपूर जीने की
थी ललक, कुछ भी कर गुजरने की 
जिंदगी एक किताब खूबसूरत थी 
जिसे पढ़ने की प्यार से तमन्ना थी 

फिर घेरा ऐसा बादलों ने निराशा के 
खुद से बातें करती,हंसती,रोती,बावली 
सी, ना चाह रही जीने की ना ललक 
कुछ करने की ...........................
बिखरी हुई सी ज़िंदगी,पन्ना-दर-पन्ना 
पलती गई यूँ ही, ज़िंदगी रेत की तरह 
हाथ से फिसलती गई

जाग उठी है अब फिर से वही पुरानी 
चाह जीने की,ललक कुछ करने की 
जिंदगी की खूबसूरत किताब को 
तमन्ना प्यार से पढ़ने की 
मिट्टी,हवा,पानी सब को पीछे छोड़ हाथ 
बढ़ा कर शून्य को छूने की , शायद ये 
तुमसे मिलने का असर है मुझ पर ||


(मौलिक /अप्रकाशित)

*चित्र - साभार गूगल 

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Comment by Pankaj Trivedi on March 3, 2013 at 3:19pm

प्रेम का गहन भाव... सुंदर

Comment by Meena Pathak on March 2, 2013 at 12:13pm

रचना सराहने के लिए हार्दिक आभार आ.लक्ष्मण प्रसाद  जी ..

Comment by Meena Pathak on March 2, 2013 at 12:11pm

सादर आभार संदीप जी 

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on March 2, 2013 at 11:29am

सुन्दर भाव प्रधान रचना, वाकई जिन्दगी खुबसूरत खुली किताब की तरह होती है, जिसे पढ़कर यथार्थ को ढूंढते हुए जिन्दगी को और बेहतर बनाया जा सकता है | हार्दिक बधाई आदरणीया मीना पाठक जी 

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on March 1, 2013 at 10:43pm
बहुत सुन्दर भाव प्रधान रचना बधाई हो आदरणीय
Comment by Meena Pathak on March 1, 2013 at 6:36pm

आ.श्याम नारायन जी सादर आभार 

Comment by Meena Pathak on March 1, 2013 at 6:34pm

सादर आभार बृजेश जी 

Comment by बृजेश नीरज on March 1, 2013 at 6:19pm

बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति! बधाई स्वीकार करें आदरणीया!

Comment by Shyam Narain Verma on March 1, 2013 at 5:48pm

आदरणीय

बहुत खूब ............................
शुभकामनायें-

Comment by Meena Pathak on March 1, 2013 at 5:34pm

सादर आभार आ. रविकर जी 

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