For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

नए ख्वाब खुद को दिखाने लगे हैं

 

नए ख्वाब खुद को दिखाने लगे हैं

वो उनमें भी तशरीफ़ लाने लगे हैं

 

समंदर किनारे ठहरने को थोडा

लहरों को कितना मनाने लगे हैं

 

वही बात तुमसे जो कहनी थी छुपकर 

महफ़िल में गाकर सुनाने लगे हैं

 

हैं करते खुशामद सितारों की अब तो

हर इक दर पे सर को झुकाने लगे हैं

 

भुला दे खिलौने दुपहरी के अब तो

तुझे सांझ लोरी सुनाने लगे हैं

 

-पुष्यमित्र

Views: 443

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by वीनस केसरी on March 13, 2013 at 1:35am

बहुत खूब

Comment by Pushyamitra Upadhyay on March 13, 2013 at 12:09am

आदरणीय सौरभ सर आपने जो संशोधन बतलाये हैं उनमें मुझे पूर्व से ही संशय था मगर जैसा कि आपने कहा मायने बदल जायेंगे तो इसीलिए मैं दूसरा उपर्युक्त  हल ढूंढ़ नहीं पाया किन्तु आपने मेरी दुविधा हल कर दी...आपके मार्गदर्शन अक कोटिशः आभारी हूँ| आगे भी आपके मार्ग्धार्शन की कामना करता हूँ, अनुज का प्रणाम स्वीकार कीजिये|


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on March 11, 2013 at 10:53pm

भाई पुष्यमित्र जी,  इस ग़ज़ल को हमसब से साझा करने के लिए तो पहले बधाई.

इस ग़ज़ल को पढ़ते समय जो मुझे महसूस हो रहा था वो यही था कि या तो ग़ज़लकार ग़ज़ल की बह्र को अपने हिसाब से जानता-समझता है या मैं ही प्रयुक्त हुई बह्र के वज़्न को नहीं समझ पा रहा हूँ.

फिर ध्यान से देखा तो इस ग़ज़ल की बह्र मुतकारिब मुसम्मन सालिम, वज्न: १२२, १२२, १२२, १२२,  है.

इस लिहाज से आपकी इस ग़ज़ल के कुछ मिसरे थोड़ा और ध्यान चाहते हैं.  जैसे -

लहरों को कितना मनाने लगे हैंयहाँ लहरों को ’किनारों’ कर दिया जाय या ऐसा ही कुछ तो समस्या ख़त्म. यानि,  किनारों को कितना मनाने लगे हैं .. .

मगर आगे, ये तो आपको बेहतर मालूम होगा कि मिसरे की कहन में इस तब्दीली का क्या प्रभाव पड़ेगा.

महफ़िल में गाकर सुनाने लगे हैं  = इस मिसरे में भी महफ़िल में  को बदल कर ’भरी बज़्म’ कर दिया जाय समस्या ख़त्म.  यानि, भरी बज़्म गाकर सुनाने लगे हैं ..   या ऐसा ही कुछ

अब ग़ज़ल पर -

कहना न होगा कि इस ग़ज़ल के शेर अत्यंत भावुक हृदय से निकले हैं.

भुला दे खिलौने दुपहरी के अब तो
तुझे सांझ लोरी सुनाने लगे हैं

उपरोक्त शेर के लिए विशेष दाद दे रहा हूँ.. .

Comment by Yogi Saraswat on March 11, 2013 at 11:39am

वही बात तुमसे जो कहनी थी छुपकर 

महफ़िल में गाकर सुनाने लगे हैं

 

हैं करते खुशामद सितारों की अब तो

हर इक दर पे सर को झुकाने लगे हैं

 

भुला दे खिलौने दुपहरी के अब तो

तुझे सांझ लोरी सुनाने लगे हैं

 sundar shabd

Comment by asha pandey ojha on March 9, 2013 at 9:13pm

bahut hi badhiya ..

Comment by ram shiromani pathak on March 9, 2013 at 7:16pm

bahot khoob.........bhai g

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"आ. भाई जयहिंद जी, सादर अभिवादन। सुंदर गजल हुई है। भाई रवि जी की सलाह से यह और निखर गयी है । हार्दिक…"
2 hours ago
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा पंचक. . . दिल

दोहा पंचक. . . . . दिलरात गुजारी याद में, दिन बीता बेचैन ।फिर से देखो आ गई, दिल की दुश्मन रैन…See More
12 hours ago
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"ग़ज़ल 2122   1212  22 आ कभी देख तो ले फ़ुर्सत में क्या से क्या हो गए महब्बत में मैं…"
15 hours ago

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Saurabh Pandey's blog post नवगीत - भैंस उसी की जिसकी लाठी // सौरभ
"  आपका हार्दिक धन्यवाद, आदरणीय लक्ष्मण धामी ’मुसाफिर’ जी   "
18 hours ago

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Sushil Sarna's blog post दोहा एकादश. . . . . पतंग
"आदरणीय सुशील सरनाजी, पतंग को लगायत दोहावलि के लिए हार्दिक बधाई  सुघड़ हाथ में डोर तो,…"
18 hours ago
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"आदरणीय रवि भसीन 'शहीद' जी सादर अभिवादन बहुत शुक्रिया आपने वक़्त निकाला ग़ज़ल तक आए और हौसला…"
22 hours ago
Sushil Sarna posted blog posts
yesterday
रवि भसीन 'शाहिद' commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"आदरणीय Jaihind Raipuri जी,  अच्छी ग़ज़ल हुई। बधाई स्वीकार करें। /आयी तन्हाई शब ए…"
yesterday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on रामबली गुप्ता's blog post कर्मवीर
"कर्मवीरों के ऊपर आपकी छांदसिक अभिव्यक्ति का स्वागत है, आदरणीय रामबली गुप्त जी.  मनहरण…"
yesterday
Jaihind Raipuri posted a blog post

ग़ज़ल

2122    1212    22 आ कभी देख तो ले फ़ुर्सत मेंक्या से क्या हो गए महब्बत में मैं ख़यालों में आ गया उस…See More
yesterday
Jaihind Raipuri commented on Admin's group आंचलिक साहित्य
"कुंडलिया छत्तीसगढ़ी छत्तीसगढ़ी ह भाखा, सरल ऐकर बिधान सहजता से बोल सके, लइका अऊ सियान लइका अऊ…"
yesterday
Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post दोहा पंचक. . . . रिश्ते
"आदरणीय लक्ष्मण धामी जी सृजन के भावों को मान देने का दिल से आभार आदरणीय "
Monday

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service