For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

ये फिजाएं खोलती हैं राज गहरे कई

इस कली में बंद हैं नादान भौंरे कई

 

हम तो आशिक हैं हमारा क्या बहल जाएंगे

आपके दामन पे हैं ये दाग गहरे कई

 

देर तक खामोश सी रोती रही जिंदगी

छूटते हैं जो यहां पर थे सहारे कई

 

इस जहां की दौलतें बेकार होने लगीं

हाथ फैलाए खड़े उसके दुआरे कई

 

जुल्म कितने बढ़ गए आवाज होती नहीं

अब यहां रहने लगे गूंगे व बहरे कई

                      - बृजेश नीरज

 

Views: 370

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by बृजेश नीरज on March 16, 2013 at 9:23pm

आदरणीय सौरभ जी, यह आपके मार्गदर्शन का ही परिणाम है। कुछ सीखने के लिए एक अच्छे गुरू की आवश्यकता होती है। आपने मेरे लिए वह कमी पूरी कर दी है। आपका मार्गदर्शन यदि यूं ही प्राप्त होता रहा तो शायद आगे स्वयं के लेखन में कुछ और सुधार कर सकूं।
सादर!


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on March 16, 2013 at 9:00pm

शिल्प को बाँधे रखा है यह आश्वस्त करता है, बृजेश भाई.

कहन में भी कसावट आ रही है. ..

जुल्म कितने बढ़ गए आवाज होती नहीं
अब यहां रहने लगे गूंगे व बहरे कई  .. ..  बहुत खूब !

Comment by बृजेश नीरज on March 16, 2013 at 12:40pm

आदरणीय योगी जी आपका आभार!

Comment by Yogi Saraswat on March 16, 2013 at 11:30am

हम तो आशिक हैं हमारा क्या बहल जाएंगे

आपके दामन पे हैं ये दाग गहरे कई

 

देर तक खामोश सी रोती रही जिंदगी

छूटते हैं जो यहां पर थे सहारे कई

बहुत सुन्दर अश आर

Comment by बृजेश नीरज on March 15, 2013 at 8:12pm

आदरणीय स्वर्ण जी आपका आभार!

Comment by Dr. Swaran J. Omcawr on March 15, 2013 at 7:46pm

साहित्य समाज का आइना  है 

ग़ज़ल में कई अच्छे शेयर हैं

which i have liked, thanks 

 

 

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Blogs

Latest Activity

Manan Kumar singh replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-128 (विषय मुक्त)
"भड़ास'मुझे हिंदी सिखा देंगे?फेसबुक की महिला मित्र ने विकल जी से गुजारिश की।'क्यों…"
1 hour ago
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-128 (विषय मुक्त)
"वतन में जतन (लघुकथा) : अमेरिका वाले ख़ास रिश्तेदार अपने युवा बच्चों को स्वदेश घुमाने और…"
3 hours ago
Admin replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-128 (विषय मुक्त)
"स्वागतम"
yesterday
Jaihind Raipuri replied to Admin's discussion र"ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-185
"जी बहुत शुक्रिया आदरणीय चेतन प्रकाश जी "
yesterday
Dayaram Methani replied to Admin's discussion र"ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-185
"आदरणीय मिथलेश वामनकर जी, प्रोत्साहन के लिए बहुत बहुत धन्यवाद।"
yesterday
Chetan Prakash replied to Admin's discussion र"ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-185
"आ.लक्ष्मण सिंह मुसाफिर साहब,  अच्छी ग़ज़ल हुई, और बेहतर निखार सकते आप । लेकिन  आ.श्री…"
yesterday
Chetan Prakash replied to Admin's discussion र"ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-185
"आ.मिथिलेश वामनकर साहब,  अतिशय आभार आपका, प्रोत्साहन हेतु !"
yesterday
Chetan Prakash replied to Admin's discussion र"ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-185
"देर आयद दुरुस्त आयद,  आ.नीलेश नूर साहब,  मुशायर की रौनक  लौट आयी। बहुत अच्छी ग़ज़ल…"
yesterday
Chetan Prakash replied to Admin's discussion र"ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-185
" ,आ, नीलेशजी कुल मिलाकर बहुत बहुत अच्छी ग़ज़ल हुई,  जनाब!"
yesterday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion र"ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-185
"आ. भाई मिथिलेश जी, सादर अभिवादन। गजल पर उपस्थिति और स्नेह के लिए आभार।"
yesterday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion र"ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-185
"आ. भाई नीलेश जी, सादर अभिवादन।  गजल पर उपस्थिति और स्नेह के लिए आभार। भाई तिलकराज जी द्वार…"
yesterday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion र"ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-185
"आ. भाई तिलकराज जी, सादर अभिवादन। गजल पर उपस्थिति और विस्तृत टिप्पणी से मार्गदर्शन के लिए आभार।…"
yesterday

© 2025   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service