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सखी री मोरे अंगना में धूप खिली आज

सखी री मोरे अंगना में धूप  खिली आज 

मन की प्रणय पाती साजन को मिली आज 

हुआ यकायक मुझे अंदेशा 

भेजा उसने कोई संदेशा 

नेह नीर बिना  शुष्क हुई थी 

देह प्रीत बिना  रुष्ट हुई थी 

लिपट पवन  संग  हिय तरु की डारि  हिली आज 

सखी री मोरे अंगना में धूप  खिली आज 

आह्लादित  मन लहका- लहका

प्रीत  उपवन  है   महका- महका  

मिले गले जब भ्रमर औ कलिका   

हया दीप संग  जलती   अलिका    

विरहाग्नि से हुई विक्षत चुनरिया सिली आज   

सखी री मोरे अंगना में धूप  खिली आज 

जाने क्यों ये मन भरमाया 

खुदी  में ढूँढू उसका साया 

इत - उत देखूं लगे वो आया 

झट चौखट  पे दीपक  जलाया 

सागर मन मध्य मौजों की खुशियाँ रिली आज 

सखी री मोरे अंगना में धूप  खिली आज 

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Comment

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on April 17, 2013 at 8:10am

प्रिय वंदना तिवारी जी आपको गीत रुचिकर लगा प्रशंसा हेतु हार्दिक आभार आपका । 

Comment by Vindu Babu on April 16, 2013 at 10:40pm
प्रेम से सराबोर भावाभ्यक्ति!
नेह नीर बिन शुष्क हुई थी...
अति सुमदर आदरणीया।
सादर

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on April 16, 2013 at 9:49pm

राजेश कुमार झा जी आपको गीत पसंद आया हार्दिक आभार आपका। 

Comment by राजेश 'मृदु' on April 16, 2013 at 5:53pm

बड़ी मीठी रचना आपने पोस्‍ट की है, इस मीठेपन के लिए हार्दिक बधाई


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on April 16, 2013 at 2:28pm

प्रिय विजय श्री जी आपको गीत पसंद आया उत्साह वर्धन करती प्रतिक्रिया हेतु हार्दिक आभार |

Comment by vijayashree on April 16, 2013 at 1:20pm

सखी री मोरे अंगना में धूप  खिली आज 

जाने क्यों ये मन भरमाया 

खुदी  में ढूँढू उसका साया 

इत - उत देखूं लगे वो आया 

झट चौखट  पे दीपक  जलाया 

सागर मन मध्य मौजों की खुशियाँ रिली आज 

 

प्रेम रस में पगी सुंदर रचना के लिए आपको हार्दिक बधाई

 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on April 16, 2013 at 11:55am

योगी सारस्वत  जी आपने गीत का आनंद लिया आपकी उत्साह वर्धन करती हुई टिपण्णी हेतु हार्दिक आभार |

Comment by Yogi Saraswat on April 16, 2013 at 11:03am

नेह नीर बिना  शुष्क हुई थी 

देह प्रीत बिना  रुष्ट हुई थी 

लिपट पवन  संग  हिय तरु की डारि  हिली आज 

सखी री मोरे अंगना में धूप  खिली आज 

आह्लादित  मन लहका- लहका

प्रीत  उपवन  है   महका- महका  

मिले गले जब भ्रमर औ कलिका   

हया दीप संग  जलती   अलिका    

विरहाग्नि से हुई विक्षत चुनरिया सिली आज   

सखी री मोरे अंगना में धूप  खिली आज

बहुत दिनों बाद श्रृंगार रस की बहुत सुन्दर रचना पढने को मिली है ! बहुत सुन्दर आदरणीया राजेश कुमारी जी ! बधाई


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on April 16, 2013 at 10:36am

आदरणीय गणेश बागी जी आपको गीत पसंद आया मेरी लेखनी को सार्थकता मिली दिल से आभारी हूँ । 


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on April 16, 2013 at 9:44am

नायिका जब प्रीतम से मिलती है तभी दिन धूपमय और रात चाँदनी होती है, श्रृंगार रस में पगी बहुत ही सुन्दर रचना, बधाई प्रेषित है आदरणीया राजेश कुमारी जी ।  

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