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माथुर साहब बड़े सुलझे हुए आदमी है ।जीवन की संध्या में वे आगे की सोच रखते हैं । इसलिए उन्होंने उनके बाद उनके मकान के बंटवारे के लिए अपने दोनों बेटों और बेटी को बुला कर बात करने की सोची ताकि उनके दिल में क्या है ये जान सकें । 
 
बेटों ने सुनते ही कहा पापा आप जो भी निर्णय करेंगे हमें मंजूर होगा । लेकिन बेटी ने सुनते ही कहा हाँ पापा मुझे इस मकान में हिस्सा चाहिए ।माथुर साहब और उनके दोनों बेटे चौंक गए । माथुर साहब की बेटी की शादी बहुत बड़े घर में हुई थी । उसके लिए उनके मकान का हिस्सा बहुत मायने नहीं रखता था । फिर भी उसकी हिस्से की चाह? स्वाभाविक था एक कडवाहट सी उनके मुंह में घुल गयी । साथ ही ये ख्याल आते ही उनकी नज़रें झुक गयीं की उनकी तथाकथित प्रगतिशीलता बेटी के हिस्सा माँगते ही बगलें झांकने लगी थी।
फिर भी प्रकट में उन्होंने कहा हाँ बेटी बता तुझे इस मकान में कौन सा हिस्सा चाहिए?
पापा मुझे इस मकान का सबसे बड़ा हिस्सा चाहिए । आप अपनी वसीयत में लिखियेगा की मेरी पूरी जिंदगी इस घर के दरवाजे मेरे लिए हमेशा खुले रहें । 
माथुर साहब मुस्कुरा दिए और दोनों भाइयों ने बहन को गले लगा लिया । जरूर बहना तेरा ये हिस्सा हमेशा बना रहेगा । अब बंटवारे की जरूरत नहीं थी । 
 

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Comment by manoj shukla on April 18, 2013 at 6:53am
बहुत ही सुन्दर लघुकथा लिखा है आपने....बधाई स्वीकार करें आदर्णीया

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on April 17, 2013 at 7:54pm

सच कहा आज भी लोगों की सो काल्ड विकास शीलता लड़की का जायदाद में कुछ मांगने पर बौखला जाती है भले ही मकान बेटों की मांग  पर दो हिस्सों में बटेगा पर लड़की ने  क्यों माँगा यहीं पता चल जाता है की लोगों की क्या मानसिकता है इसी कहानी में यदि लड़की सचमुच मांग लेती तो भाई उससे रिश्ता वहीँ ख़त्म कर देते हर लड़की ये जानती है इसी लिए कोई भी मांग नहीं करती अब समाज से यही सवाल है की क्या रिश्ते सिर्फ लड़कियों को ही निभाने चाहिए लडको को नहीं बहनों को ही भाइयों की चिंता होनी चाहिए भाइयों को नहीं ??सही तो ये होता की जब भाई बटवारे की बात कर रहे हैं तो बहन को भी साथ लें या पिता को उस वक़्त बेटी से खुद कहना चाहिए किन्तु नहीं अभी पूर्णतः विकसित मानसिकता बहुत दूर है आपकी यह लघु कथा जिसका अंत सभी को अच्छा  लगेगा किन्तु बहुत से सवाल अपने पीछे छोड़ता है। बहुत बढ़िया कहानी लिखी है बहुत- बहुत बधाई।  

Comment by Yogi Saraswat on April 17, 2013 at 11:40am

अगर यही सोच रहे तो सबका जीवन खुशहाल रहे ! बहुत सुन्दर भाव और बढ़िया सन्देश देती लघु कथा

Comment by बृजेश नीरज on April 16, 2013 at 7:31pm

प्रगतिशीलता पर व्यंग्य करती सुखद अंत में सुन्दर संदेश देती लघु कथा। बधाई स्वीकारें।

Comment by Sonam Saini on April 16, 2013 at 1:39pm

आदरणीय कविता जी नमस्कार
एक सीख देती अछि लघु कथा .....शुभकामनाये

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on April 16, 2013 at 1:31pm

बहुत ही सुंदर लघु कथा आदरनेया सादर बधाई स्वीकार कीजिए 


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on April 16, 2013 at 9:26am

आदरणीया कविता जी, लघुकथा बहुत ही अच्छी हुई है, कानून जो भी अधिकार दे दे, किन्तु दिलों में अधिकार तो स्वयं को ही बनाना पड़ता है, इस संदेशपरक लघुकथा पर ह्रदय से बधाई आदरणीया । 

Comment by Ashok Kumar Raktale on April 15, 2013 at 11:22pm

आदरणीया कविता वर्मा जी सुन्दर संदेश देती लघुकथा. जायदाद में बेटी के हिस्से के लिए कुछ अच्छे कानून की दरकार है. बहुत बहुत बधाई.

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