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तुम कैसे श्रेष्ठ ? // गणेश जी "बागी"

हे पूज्य !

आप ग़लत थे,
मैं सही था |

आप के कहे को
मान दिया था,
अनुचित आदेश को
मान लिया था |
आप पर विश्वास था,
मिला था आशीर्वाद-
एक अफलित आशीर्वाद |

हे पूज्य!
आप ग़लत थे,
मैं सही था |

आपने तोड़ा था विश्वास,
किंचित, मुझे नही मानना था
संकुचित आदेश,
मुझे नही देना था-
अंगूठा,
दिखला देना था-
अंगूठा,


क्या होता ?
नालायक कहलाता !
अल्प काल के लिए,
किंतु नही घुलता
तिल-तिल, प्रति-दिन,

हे पूज्य!
आज भी लगता है,
आप ग़लत थे,
किंतु,
मैं भी ग़लत था,

आपको सुनता रहा ।
पिछला पोस्ट => अंतर्द्वंद्व

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Comment

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मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on April 17, 2013 at 9:46am

बहुत बहुत आभार आदरणीया शालिनी कौशिक जी । 


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on April 17, 2013 at 9:46am

सराहना हेतु बहुत बहुत आभार आ० केवल प्रसाद जी । 


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on April 17, 2013 at 9:45am

आदरणीया राजेश कुमारी जी, आपके कहे से सहमत हूँ, मेरे लिए अतुकांत शैली में लिखना एक तरह से नवीन ही है, रचना भाव संप्रेषित कर सकी और आप से सराहना प्राप्त कर सकी, यह अत्यंत ही आनंद का विषय है,सादर आभार । 


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on April 17, 2013 at 9:40am

आदरणीयवंदना तिवारी जी, आपसे सराहना पाकर रचना और रचनाकार दोनों गौरवान्वित हैं । सादर आभार । 


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on April 17, 2013 at 9:39am

बहुत बहुत आभार प्रिय संदीप जी । आपको रचना अच्छी लगी, जान मन हर्षित है ।  

Comment by manoj shukla on April 17, 2013 at 9:12am
बधाई स्वीकार करें आदर्णीय.....बहुत सुन्दर रचना

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on April 17, 2013 at 9:01am

अंगूठे के इंगित से सर्वस समर्पण और त्याग कर देने का भाव बखूबी व्यक्त हुआ है आदरणीय गणेश जी..

इस इंगित के विस्तार पर मन मुग्ध है....

एकलव्य के पौराणिक प्रसंग गुरु-आज्ञा पालन को अपना धर्म समझने से लेकर सामयिक परिपेक्ष में अंगूठे के निशान या हस्ताक्षर किसी नितांत विश्वसनीय पर भरोसा करके दे देना...या अपना सर्वस्व ही उस अंधभक्ति में समर्पित कर देना.... और फिर जीते जाना एक अधूरेपन के साथ, भावनाओं के छलावे के साथ.

पर भावों की श्रेष्ठता तो देखिये..

इतने सब के बाद भी 

हे पूज्य!......................यही सम्मान देता हुआ संबोधन 
आज भी लगता है,
आप ग़लत थे,
किंतु,
मैं भी ग़लत था,....................और अपनी भी गलती को देखना, अपने हाल का दायित्व भी खुद पर ही ले लेना ..वाह !

इस उत्कृष्ट रचना के लिए हृदय से बधाई प्रेषित है आदरणीय गणेश जी.

सादर. 

Comment by Ashok Kumar Raktale on April 17, 2013 at 7:51am

आदरणीय बागी जी सादर प्रणाम, युगों युगों से चली आ रही मान देने की परम्परा, आज भी कुछ लोग माता के चरणों में जीभ चढाते हैं. मगर सत्य शाश्वत  और सही मार्ग है.किन्तु आज भी कहने में संकोच ही झलक रहा है. बहुत सुन्दर रचना. हार्दिक बधाई स्वीकारें.

Comment by shalini kaushik on April 17, 2013 at 12:59am
galat kabhi nahi manna chahiye ,bahut sundar bhavabhivyakti .badhai
Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on April 16, 2013 at 10:30pm

आदरणीय गनेश जी बागी जी,  ’आप पर विश्वास था, मिला था आशीर्वाद...’ श्रध्दा, विश्वास, गुरूभक्ति, आत्म सम्मान, और त्याग का नाम ही एकलब्य है।  अतिसुन्दर। हार्दिक बधाई स्वीकारें। सादर,

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