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आज फिर उसका मन व्यथित था
हाहाकार कर रहा था हृदय
एक कथित पुरुष में
हैवान साकार हुआ था फिर.. 
फिर हैवानियत जीत गई थी 
नरपिशाच के पंजों में
आ गई थी 
फिर एक नन्ही /मासूम सी 
गुड़िया 
आज फिर उसने
अख़बार छिपाया.. 
टीवी के केबल 
निकाल दिये..
उसके भी घर मे  
एक गुड़िया है 
उससे आँख जो मिलानी है..!

आख़िर वह भी तो
एक मर्द है....
"मौलिक व अप्रकाशित" 
पिछला पोस्ट => तुम कैसे श्रेष्ठ ?

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Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on April 25, 2013 at 7:12pm

उससे आँख जो मिलानी है..! पर कैसे मिलावे -

अब यही तो हो रही ग्लानी है, दरकार अब 

नैतिक शिक्षा ही इसके मानी है | 

बाकी तो सब ही मानो बेमानी है -- सुन्दर रचना जिसे पढ़कर ही द्रश्य आँखों के सामने देख गला रुंध जाता है 

हार्दिक बधाई आदरनीय श्री गणेशजी बागी जी

 

Comment by Vindu Babu on April 24, 2013 at 10:15pm
आदरणीय बागी सर सादर प्रणाम!
बिल्कुल यथार्थ को बयां करती व अन्त: को कुरेदती हुई रचना।अखबार छिपाने/केबल हटाने की प्रवृत्ति नन्हीं बच्ची की क्या,वह तो बेचारी मासूम है ही,लगभग सम्पूर्ण महिला समाज की होती जा रही है महोदय,क्योंकि पशुवत् घटनाएं तो नित्य हो रहीं हैं और समाधान दूर-दूर तक दीखता नहीं...
अति मार्मिक प्रस्तुति!
सादर
Comment by ram shiromani pathak on April 24, 2013 at 9:28pm

आदरणीय गणेश सर जी,बहुत सटीक व्यंग है आपका //मानवता लगता है मर रही है ///

अथार्थ से अवगत कराती रचना//प्रणाम सहित   हार्दिक बधाई स्वीकारे।


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on April 24, 2013 at 4:52pm

फोन से इस रचना के संदर्भ में जो कहना था खुल कर कहा अब मौका मिला है कि लिखित रूप से साझा करूँ. जिस दौर से हम गुजर रहे हैं वह दौर राक्षसी व्यवहार के विस्फोट का है. तंदूर में जलाते-जलाते हम बच्चियों की अस्मिता तक आगये हैं.

आगे क्या कहूँ ? आपकी वैचारिक ऊहापोह को मेरा समर्थन.

हार्दिक धन्यवाद हृदय की खिन्नता को स्वर देने के लिए.. .

Comment by Dr.Ajay Khare on April 24, 2013 at 2:21pm

adarniy bagi aaj ke paripechy ka chitran manodasha ka aaklan aapne bade hi sateek tarike se pesh kiya v bishay ke prati apni sambedna jatai kabile tareef hai badhai

Comment by अरुन 'अनन्त' on April 24, 2013 at 1:24pm

आदरणीय भ्राताश्री बागी सर जी सादर, वर्तमान घटना का घिनौना सच बयां किया है आपने, किस तरह से आपने अपने घायल मन की पीड़ा को शब्दों का रूप दिया है. आपकी लेखनी को मेरा विन्रम प्रणाम. भगवान अब केवल देर ही नहीं अंधेर भी हो गई है कहाँ हो प्रभु जागो.

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on April 24, 2013 at 10:24am

आ0 गणेशजी बागी जी,  कोटि-कोटि नमन!  सर जी,   अतिसुन्दर और, मन को झकझोरती  सार्थक रचना।  हार्दिक बधाई स्वीकारे।  सादर,

Comment by कल्पना रामानी on April 24, 2013 at 9:46am

आज की बढ़ती पाशविक वृत्तियों  पर चोट करती हुई मर्म भेदी रचना, काश! दरिंदों की भी नज़र यहाँ तक पहुँच पाती....

आदरणीय बागी जी, मन को झकझोर देने वाली रचना से मन बहुत व्यथित हो गया है बधाई क्या दूँ, बस आपकी लेखनी को नमन ।... 


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on April 24, 2013 at 9:10am

सहमत हूँ आदरणीय संजय भाई, टिप्पणी हेतु आभार ।


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on April 24, 2013 at 9:09am

आदरणीय अशोक कत्याल जी, कविता आपको अच्छी लगी यह जान मन गदगद हुआ, बहुत बहुत आभार |

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