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लीक से हटकर एक प्रयोग: मुक्तिका: संजीव 'सलिल'

आत्मीय!

मुशायरे के लिए लिख रहा था की समय समाप्त हो गया. पूर्व में भेजा पथ निरस्त करदें. इसे जहाँ चाहें लगा दें.

लीक से हटकर एक प्रयोग:

मुक्तिका:

संजीव 'सलिल'
*
हवा करती है सरगोशी बदन ये काँप जाता है.
कहा धरती ने यूँ नभ से, न क्यों सूरज उगाता है??
*
न सूरज-चाँद की गलती, निशा-ऊषा न दोषी हैं.
प्रभाकर हो या रजनीचर, सभी को दिल नचाता है..
*
न दिल ये बिल चुकाता है, न ठगता या ठगाता है.
लिया दिल देके दिल, सौदा नगद कर मुस्कुराता है.
*
करा सौदा खरा जिसने, जो जीता वो सिकंदर है.
क्यों कीमत तू अदा करता है?, क्यों तू सिर कटाता है??
*
यहाँ जो सिर कटाता है, कटाये- हम तो नेता हैं.
हमारा शौक- अपने मुल्क को ही बेच-खाता है..
*
करें क्यों मुल्क की चिंता?, सकल दुनिया हमारी है..
है बंटाढार इंसां चाँद औ' मंगल पे जाता है..
*
न मंगल अब कभी जंगल में कर पाओगे ये सच है.
जहाँ भी पग रखे इंसान उसको बेच-खाता है..
*
न खाना और ना पानी, मगर बढ़ती है जनसँख्या.
जलाकर रोम नीरो सिर्फ बंसी ही बजाता है..
*
बजी बंसी तो सारा जग, करेगा रासलीला भी.
कोई दामन फँसाता है, कोई दामन बचाता है..
*
लगे दामन पे कोई दाग, तो चिंता न कुछ करना.
बताता रोज विज्ञापन, इन्हें कैसे छुड़ाता है??
*
छुड़ाना पिंड यारों से, नहीं आसां तनिक यारों.
सभी यह जानते हैं, यार ही चूना लगाता है..
*
लगाता है अगर चूना, तो कत्था भी लगाता है.
लपेटा पान का पत्ता, हमें खाता-खिलाता है..
*
खिलाना और खाना ही हमारी सभ्यता- मानो.
मगर ईमानदारी का, हमें अभिनय दिखाता है..
*
किया अभिनय न गर तो सत्य जानेगा जमाना यह.
कोई कीमत अदा हो हर बशर सच को छिपाता है..
*
छिपाता है, दिखाता है, दिखाता है, छिपाता है.
बचाकर आँख टंगड़ी मार, खुद को खुद गिराता है..
*
गिराता क्या?, उठाता क्या?, फंसाता क्या?, बचाता क्या??
अजब इंसान चूहे खाए सौ, फिर हज को जाता है..
*
न जाता है, न जायेंगा, महज धमकायेगा तुमको.
कोई सत्ता बचाता है, कमीशन कोई खाता है..
*
कमीशन बिन न जीवन में, मजा आता है सच मानो.
कोई रिश्ता निभाता है, कोई ठेंगा बताता है..
*
कमाना है, कमाना है, कमाना है, कमाना है.
कमीना कहना है?, कह लो, 'सलिल' फिर भी कमाता है..
*

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Comment

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मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on November 26, 2010 at 8:40pm
आचार्य जी, कृपया ऐसा ना कहे, आप की डाट भी यदि होगी तो वह मेरे लिये आशीर्वाद ही है, मैं सामान्य रूप से ही लिखा है और ठूसना शब्द अच्छा लगा इसलिये मैने भी हास्य पूट के ख्याल से ही दुहरा दिया था |कृपया अन्य अर्थ ना निकाले | :-))))
Comment by sanjiv verma 'salil' on November 26, 2010 at 8:13pm
अरे बागी जी रुष्ट न हों. यह रचना उलटबांसी की तरह है. उसी मनःस्थिति (मूड) में आपके प्रति आभार इस तरह व्यक्त कर गया. ठंसना-ठंसाना तो हम भारतीयों का जन्म-सिद्ध अधिकार है. देश में जनसंख्या बाहुल्य के बावजूद हम सब ठंस ही गये हैं और न जाने कब तक कितने और ठंसते जायेंगे. यह सहज हास्य-व्यंग के रंग में है.
आप अन्यथा न लें आपने इन पंक्तियों को स्थान दिया इस हेतु बहुत-बहुत आभार. रचना के कथ्य पर आपकी प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा है.
मेरा एक स्थानांतरण आदेश आ चुका है. दूसरा शीघ्र ही आनेवाला है. संभवतः अन्य जिले में जाना होगा. परिवार यहीं रहेगा, अकेला ही जाऊँगा. वहाँ निजी संगणक भी न होगा. अतः, सहभागिता भी स्वतः ही समाप्तप्राय हो जाएगी. आगे आपको कष्ट न होगा. जब स्थिति वर्तमान की तरह होगी तब फिर सहभागिता हो सकेगी. आदेश के परिपालन में जानेतक आप सबको कष्ट देता रहूँगा.

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on November 24, 2010 at 9:02pm
आचार्य जी , चुकि आपने अनुमति दी थी "मुशायरे के लिए लिख रहा था की समय समाप्त हो गया. पूर्व में भेजा पथ निरस्त करदें. इसे जहाँ चाहें लगा दें" सो मैने लगा दिया या आपके द्वारा लिखे टिप्पणी के शब्दों मे कहे तो ठूस दिया |
यदि आप कहे तो मैं वहां से हटा दूँ , जैसा आप कहे कर दिया जायेगा |
Comment by sanjiv verma 'salil' on November 24, 2010 at 8:48pm
आत्मीय बंधुओं!
वंदे मातरम.
कुछ व्यक्तिगत-पारिवारिक, कुछ शासकीय परेशानियों के कारण इस बार मुशायरे में चाहकर भी नियमित उपस्थिति संभव न हो सकी. गैरहाजिरी से बचने के लिए चलते-चलते की तर्ज़ पर एक मुक्तिका लगा पाया. अंत में शतक शेष धर दूँ यह सोचा तो चंद पंक्तियाँ ही कलम से उतरीं कि महाकाल के इस उपासक को काल का लोहा मानना पड़ा. सारी पंक्तियाँ काल-बाह्य हो गयीं लेकिन हम हिन्दुस्तानी भी हर जगह अतिक्रमण के आदी हैं और कानून तोड़ने की विरासत तो बापू दे ही गए हैं सो वे पंक्तियाँ बीच में ठँस गयीं या ठूँस दी गयीं कहना कठिन है. अब धर्मसंकट यह कि धन्यवाद दूँ तो गलत न दूँ तो गलत.....मुझे तो कोई राह सूझती नहीं... अनुरोध यह कि जिन्होंने न पढ़ीं हों पढ़ें पसंद न भी आयें तो कोई बात नहीं, इस विद्यार्थी का उत्साहवर्धन तो होगा ही...

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on November 24, 2010 at 7:23pm
आचार्य जी, मुशायरे मे आपकी पहली की गई पोस्ट के ठीक नीचे इसे लगा दिया गया है |

कृपया ध्यान दे...

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