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अपने अपने हिस्से का पानी

हम अपने अपने हिस्से का पानी लिए जिए जा रहें है...

देह में मचलता हुआ, लहू में बहता हुआ

और लोग जो अपनों के साथ हर सुख दुःख मे ढल जाते हैं  

हर उस आकार में जिसमें

उस घडी उनका अपना उन्हें होना देखना चाहता है

वह उनके लिए पानी सा हो जातें है .......

तो है न यह अपनों का संसार|

फिर तुम मैं

कहाँ .... दो किनारों से

अपने अपने हिस्से के पानी के साथ बढते हुए, उन्हें थामे हुए|

कभी न मिलने के लिए|

और मैं हर रोज एक अंजुली में पानी को भर

देख लेती हूँ किनारे को भिगोता हुआ एक सम्पूर्ण सागर

और किनारे जो कही भी अलग नहीं

समान्तर नहीं

वर्तुलाकार में एक साथ चलते और मिलते हुए

और उस सागर में होते हो तुम और तुम्हारा प्रतिबिम्ब

एक घूंट मैं आचमन कर लेती हूँ

बाकी से खुद को भिगो देती हूँ .................  ~nutan~

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Comment by JAWAHAR LAL SINGH on May 23, 2013 at 5:50am

बहुत ही सुंदर भाव, नूतन जी 

एक घूंट मैं आचमन कर लेती हूँ

बाकी से खुद को भिगो देती हूँ ...

Comment by Abhinav Arun on May 22, 2013 at 9:38am

एक घूंट मैं आचमन कर लेती हूँ

बाकी से खुद को भिगो देती हूँ ...

सुखद मधुर मनोरम कविता के लिए हार्दिक बधाई डॉ नूतन जी , बहुत शुभकामनायें !!

Comment by राज लाली बटाला on May 21, 2013 at 9:04pm

एक घूंट मैं आचमन कर लेती हूँ

बाकी से खुद को भिगो देती हूँ ... ! नूतन जी , बहुत खूब 

Comment by डॉ नूतन डिमरी गैरोला on May 21, 2013 at 2:10pm

धन्यवाद अमन जी... 

Comment by aman kumar on May 21, 2013 at 2:04pm

एक साथ चलते और मिलते हुए

और उस सागर में होते हो तुम और तुम्हारा प्रतिबिम्ब

एक घूंट मैं आचमन कर लेती हूँ

 बहुत  अच्छी कविता ! आपका आभार 

कृपया ध्यान दे...

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