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शार्दूलविक्रीडित छंद

शार्दूलविक्रीडित छंद

इस छन्द में चार चरण होते हैं। प्रत्येक चरण में १९ वर्ण होते हैं। १२ वर्णों के बाद तथा चरणान्त में यति होती है। गणों का क्रम इस प्रकार है - गुरु-गुरु-गुरु (मगण ), लघु-लघु-गुरु (सगण ), लघु-गुरु-लघु (जगण), लघु-लघु-गुरु (सगण ) गुरु-गुरु-लघु (तगण ), गुरु-गुरु-लघु (तगण ), गुरु |

 

माँ विद्या वर दायिनी भगवती, तू बुद्धि का दान दे |

माँ अज्ञान मिटा हरो तिमिर को, दो ज्ञान हे शारदे ||

हे माँ पुस्तक धारिणी जगत में, विज्ञान विस्तार दे |

वाग्देवी नव छंद हो रस पगा, ऐसी नयी ताल दे ||

 

संदीप पटेल “दीप”

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Comment

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Comment by VISHAAL CHARCHCHIT on June 1, 2013 at 9:34pm

अत्यन्त सुन्दर एवं सराहनीय छंद !!!!


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on June 1, 2013 at 9:07am

संस्कृत काव्य में प्रचलित छंदों में से आपने एक रोचक छंद लिया है, आदरणीय संदीपजी. बधाई स्वीकारें.. .

इस तरह के पोस्ट अनायास न दिया करें. आवश्यक शोध और अभ्यास के उपरांत उचित हो आप इन्हें भारतीय छंद विधान समूह में पोस्ट करें. इससे छंद क्रम भी बना रहेगा और संग्रह भी सोद्येश्य होगा.

आप इस मंच के मानद सदस्य हैं. आपका कोई संकेन्द्रित, विशेषकर विमुग्धता से परे हुआ प्रयास पाठकों और मंच की दृष्टि से दूरगामी होगा. आपसे मंच को बहुत आशाएँ हैं, बशर्ते आप अपने प्रयासों को संयत करें. 

हमारे साथ दिक्कत अब यह हो रही है कि कतिपय रचनाकारों को हम यह समझा सकने में असमर्थ हो रहे हैं कि ’ठोस काव्य सृजन’ और ’चमत्कृत करने की अपेक्षा’ में बहुत अंतर होता है.

ओबीओ पर कोई रचना कई-कई अर्थों में शुद्ध हुई नहीं, उस पर सुझाव आये नहीं कि ठीक वही रचना अन्य साइटों पर वाहवाहियों के तुमुलनाद में उत्फुल्ल दिखती है. ऐसा आयोजनों तक की रचनाओं के साथ हो रहा है. आयोजन समाप्त हुए नहीं रचनाओं पर टिप्पणियों का दौर चल ही रहा है.. कि, रचनाएँ अन्यान्य साइटों पर उपलब्ध करा दी जाती हैं.

अब ऐसे किसी रचनाकार की किसी रचना पर कोई क्यों या क्या टिप्पणी करे?  किसी सुझाव या सलाह को जब कोई रचनाकार इतने चलताऊ ढंग से लेने लगे, तो संदेश यह जाता है कि रचनाकार हर जगह से मात्र और मात्र वाहवाही चाहता है, न कि ठोस सुझाव.  फिर, कोई जागरुक पाठक क्यों उसकी रचनाओं पर समय जाया करे ?

तथ्य सोचनीय है, और इस पर अवश्य ध्यान देने की आवश्यकता है.

शुभेच्छाएँ.. .

Comment by coontee mukerji on May 31, 2013 at 12:59pm

वाह ! संदीप जी , आपने तो हमें कान पकड़कर  कक्षा में बिठा दिया .मजा आ गया . /सादर / कुंती .

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on May 31, 2013 at 10:59am

आदरणीय केवल प्रसाद जी, आदरणीय लक्षमण सर जी, आदरणीय राम भाई, आदरणीय श्याम नारायण वर्मा जी, आदरणीय आशुतोष सर जी , आदरणीया शालिनी जी आप सभी का उत्साहवर्धन हेतु हृदय से आभारी हूँ स्नेह यूँ ही बनाए रखिए सादर

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on May 31, 2013 at 8:37am

आ0 संदीप भाई जी,   बहुत खूब सूरत रसमयी छन्द आनन्ददायक है।  बधाई स्वीकारें।  सादर,

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on May 30, 2013 at 8:21pm

बहुत सुन्दर छंद इस छंद का "शार्दूलविक्रीडित छंद कैसा नाम है | सुन्दर भाव लिए छंद रचना प्रस्तुति के लिए बधाई 

श्री संदीप कुमार पटेल जी 

Comment by ram shiromani pathak on May 30, 2013 at 4:50pm

बहुत सुन्दर आदरणीय//// हार्दिक बधाई 

Comment by Shyam Narain Verma on May 30, 2013 at 3:39pm
इस प्रस्तुति हेतु बहुत-बहुत बधाई व शुभकामनाएँ.....
Comment by Dr Ashutosh Vajpeyee on May 30, 2013 at 2:48pm

bahut sunder chhand

Comment by shalini rastogi on May 30, 2013 at 9:31am

वाग्देवी नव छंद हो रस पगा, ऐसी नयी ताल दे ||... अद्भुत , बहुत सुन्दर भाव ... ऐसी उत्कृष्ट छंद प्रस्तुति के लिए बधाई संदीप जी! 

कृपया ध्यान दे...

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