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आशंकित सशंकित इंसान

लगा है निज आवरण बचाने में

जो बनाता रहा जीवन पर्यंत

कभी चाहे , कभी अनचाहे

जुटा है अपनी केंचुल बचाने में

जो दरकती जाती है

स्वत: ही समय के साथ

और कभी दूसरों के नोचने से ....................

"मौलिक व अप्रकाशित"

Views: 705

Comment

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Comment by vijay nikore on June 2, 2013 at 1:38am

रवि जी, रचना में भाव अच्छे लगे। बधाई।

सादर,

विजय निकोर

Comment by बृजेश नीरज on June 1, 2013 at 10:54pm

आदरणीय रचना आपसे कुछ समय चाह रही है। 'आवरण को बनाना' और 'केंचुल का दरकना' मुझे अटपटा लगा।
आपके इस प्रयास पर आपको बधाई!


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on June 1, 2013 at 8:51pm

//जुटा है अपनी केंचुल बचाने में//

सही कहा मित्र, किन्तु यह केचुल एक न एक दिन उतर ही जाता है और उस समय असलियत सबके सामने आ जाती है । सुन्दर अभिव्यक्ति, बधाई स्वीकार करें । 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on June 1, 2013 at 1:58pm

आदरीय रवि वर्माजी, संभवतः आपकी कोई पहली रचना मेरी दृष्टि में आयी है.

रचना का भावपक्ष उन्नत है. हार्दिक बधाई .. .

कृपया ध्यान दे...

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