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गिरा दे बूँदें 

प्रतीक्षारत हम 

नयन मूंदे 

*
और न कस 

हर कोई बेबस 

अब बरस 

*
चली जो हवा 

उड़ गए बादल 

हम नि:शब्द 

*

मन बहका 

आवारा बादल सा 

उड़ गया लो 

*

बरसे धार 

बढे -उमड़े प्यार 

हर्ष अपार 

*
सब है वृथा 

काश, घन सुनते 

हमारी व्यथा 

*
सलोने घन 
या तो डुबो देते हैं 

या जाते डूब

*
आये बौछार 

बजें मन के तार 

हँसे संसार 
*

थके हैं पाँव 
घन,कब मिलेगी 
नेह की छाँव 
*
आई बदली
लौट गई पीहर 
बिन बरसे 
___________________प्रो.विश्वम्भर शुक्ल 
लखनऊ 

(मौलिक और अप्रकाशित )

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Comment

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Comment by आशीष नैथानी 'सलिल' on June 14, 2013 at 2:46pm

बहुत बढ़िया हाइकू हैं आदरणीय !!

Comment by vijayashree on June 14, 2013 at 1:35pm

बदरा छाए

घन हैं साथ लाए

मन हर्षाए

 

इस भीषण गर्मी में शीतलता  आभास कराने पर बधाई

Comment by aman kumar on June 14, 2013 at 11:22am

हायकू विद्या मै आप पारंगत है ! 

अच्छा लगा कुछ न्य सिख्रने को मिला आभार !

Comment by coontee mukerji on June 14, 2013 at 1:13am

आई बदली
लौट गई पीहर 
बिन बरसे ...........बहुत सुंदर चित्र आँखों में चा गया अंत में आपने बदली का मानवीयकरण कर के रचना में चार चाँद लगा दी है आदर्णीय

सादर

कुंती .

Comment by विजय मिश्र on June 12, 2013 at 6:18pm

प्रसंशनीय , आनंद  , बधाई 

Comment by Shyam Narain Verma on June 12, 2013 at 1:01pm
इस प्रस्तुति हेतु बहुत-बहुत बधाई व शुभकामनाएँ..
Comment by Sumit Naithani on June 12, 2013 at 12:45pm

बहुत सुन्दर.........

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